असम दशकों से उग्रवाद झेल रहा है। हालांकि केंद्र सरकार ने राज्य सरकार के साथ कई बार शांति बनाए रखने के लिए वार्ती की लेकिन इससे कोई ठोस हल नहीं निकल सका। वहीं, सूत्रों ने बताया कि उल्फा के अध्यक्ष अरबिंद राजखोवा के नेतृत्व वाले वार्ता समर्थक गुट ने असम में दशकों पुरानी उग्रवाद समस्या का सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने के प्रयास में शुक्रवार को केंद्र के प्रतिनिधियों के साथ शांति वार्ता की।
उल्फा की सभी मांगों पर विस्तार से हुई चर्चा
यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) के एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें राजखोवा, 'महासचिव' अनुप चेतिया, नेता राजू बरुआ और साशा चौधरी शामिल थे, सभी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और खुफिया ब्यूरो के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत की। सूत्रों ने बताया कि बातचीत गुरुवार और शुक्रवार को लगातार दो दिनों तक हुई, जहां उल्फा की सभी मांगों पर विस्तार से चर्चा हुई।
असम में छह समुदायों के एसटी के रूप में मान्यता देने की मांग
सूत्रों ने बताया कि बातचीत में मूल लोगों की राजनीतिक सुरक्षा और असम के आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की गई। परेश बरुआ के नेतृत्व वाले कट्टरपंथी गुट के कड़े विरोध के बावजूद, राजखोवा के नेतृत्व वाले उल्फा गुट ने 2011 में केंद्र सरकार के साथ बिना शर्त बातचीत शुरू की थी। अन्य मुद्दों के अलावा, उल्फा के मांगों में असम में छह समुदायों - मोरन, मटॉक, ताई-अहोम, कोच-राजबोंगशी, सूतिया और चाय जनजातियों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) के रूप में मान्यता देना शामिल है।
असम आदिवासी बहुल राज्य में बदल जाएगा
एक सूत्र ने कह कि ये सभी समुदाय अब ओबीसी हैं और इसलिए इन्हें एसटी सूची में शामिल करने का किसी भी वर्ग से कोई विरोध नहीं है। लेकिन सरकार को संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से संसद की मंजूरी लेनी होगी। माना जाता है कि गृह मंत्रालय इस मुद्दे पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और जनजातीय मामलों के मंत्रालय के संपर्क में है। यदि इन छह समुदायों को आदिवासी का दर्जा दिया जाता है, तो इससे असम की 50 फीसदी आबादी आदिवासी हो जाएगी या असम आदिवासी बहुल राज्य में बदल जाएगा।