आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की पत्रकार वार्ता में तीन तलाक के मुद्दे पर सभी पदाधिकारी जवाब देने से बचते रहे। तर्क दिया कि मुद्दा समान नागरिक संहिता है, उस पर ही सवाल करें, तलाक उसका एक हिस्सा भर है। मीडिया के सवालों की बौछार होने पर बोर्ड के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना मौहम्मद वली रहमानी को जवाब देना पड़ा। उनका कहना था कि तलाक केमुद्दे पर बोर्ड अपना हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दायर कर चुका है। उससे ज्यादा कुछ नहीं कहना। कुरेदने पर मौलाना वली मौहम्मद नाराज भी दिखे। बाद में एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बोले मुसलमानों को तलाक देने के बारे में बदनाम किया जा रहा है। जबकि आंकड़े गवाह हैं कि देश में मस्लिमों के मुकाबेले हिंदुओं में तलाक के मामले ज्यादा हैं। इस्लाम में चार शादी करने की छूट होने के मामले में भी जानकारी नहीं होने के कारण गैर मुस्ल्मिं में गलतफहमी है। वली मौहम्मद यहां तक कह गए कि किसी को पता है कि सिबू सोरेन के 59 पत्नियां हैं। क्या वह मुसलमान है।
पत्रकार वार्ता में मुस्लिम संगठनों के एका का अभाव है, इस सवाल पर भी सफाई दी। पूछा कि कोई शिया आलिम उनके साथ पत्रकार वार्ता में नहीं है जबकि कश्मीरी गेट की शाही जामा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहसिन तकवीं के आने की बात कही जा रही थी। सफाई दी गई कि मोहर्रम होने के कारण शिया आलिम व्यस्त हैं। मौलाना तकवी बिजनौर से आ रहे हैं रास्ते में हैं।
मौलाना कल्बे सादिक बोर्ड के उपाध्यक्ष है, उनकी मर्जी बोर्ड केहर फैसले में शामिल हैं। बरेलवी मसलक के इत्तेहाद ए मिल्लत काउंसिल के सदर मौलाना तौखीर रजा के आने की भी बार बार जनकारी देते देते जरूर रहे लेकिन वह नहीं पहुंचे। इस्लाम में महिला पुरुष में भेदभाव होने केसवालों पर भी जवाब देने से बचते दिखे, ज्यादा पूछने पर इन सवालों को तर्कहीन बताकर पल्ला झाड़ा।
मुस्लिम धर्मगुरुओं और राजनीतिज्ञों से बातचीत
मौलाना महमूद मदनी
- फोटो : file photo
तीन तलाक की गैर इस्लामी ढंग से व्याख्या की जा रही है। एक बार में 3 तलाक की कोई अवधारणा नहीं है। कुरान में कहीं भी तीन तलाक का जिक्र नहीं हैं। केंद्र सरकार का रुख सही है। इस्लाम के नाम पर अन्याय गलत है। -नजमा हेपतुल्ला, मणिपुर की राज्यपाल
ला कमिशन की तरफ से पूछे गए सभी 16 सवाल समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं। फिर भी हमारी पार्टी ने इन सवालों का जबाव देना तय किया है। -असद्उद्दीन औवेसी, अध्यक्ष एमएआईएम
समान नागरिक संहिता संविधान के खिलाफ है। प्रजातांत्रिक देश में इसको लागू नहीं किया जा सकता है। भारत विभिन्न संस्कृति वाला देश है। हमें उसका सम्मान करना चाहिए। -मौलाना महमूद मदनी, राष्ट्रीय महासचिव, जमीयत उलेमा ए हिंद
देश की आजादी में मुसलमानों की बराबर की हिस्सेदारी है। किसी के पर्सनल ला में दखल गैरवाजिब है। सरकार को संवैधानिक तरीकेकेपालन करना चाहिए, न की थोपी जाए। समान नागरिक संहिता कतई मंजूर नहीं हैं। -नवेद हामिद, अध्यक्ष, आल इंडिया मुस्लिम मजलिस ए मशवरात
मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की राय साफ है कि वह संवैधानिक तरीकेके खिलाफ होने वाले किसी भी बदलाव को नहीं मानेगा। इसलिए समान नागरिक संहिता का विरोध किया जा रहा है। -कमाल फारुखी, सदस्य मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड।