महाराष्ट्र की अंधेरी पूर्व सीट पर होने वाले चुनाव के लिए एकनाथ शिंदे व उद्धव ठाकरे गुट ने अपनी-अपनी पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न चुनाव आयोग को सौंप दिए हैं। अब इन दोनों गुटों के नाम व चुनाव चिह्न पर चुनाव आयोग को अंतिम फैसला लेना है।
चुनाव आयोग इस बात की जांच करेगा कि कहीं ये चिन्ह समान तो नहीं हैं या किसी अन्य दल के द्वारा इनका इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है। आयोग यह भी जांच करेगा कि जमा किए गए चिन्ह पहले भी जमा हुए हैं या नहीं। चुनाव आयोग के सू्त्रों ने पुष्टि की कि दोनों धड़ों द्वारा वैकल्पिक चिन्ह और नाम जमा किए गए हैं।
दरअसल, हाल ही में चुनाव आयोग ने आगामी उपचुनाव (अंधेरी पूर्व) में शिवेसना के नाम और चुनाव चिह्न 'धनुष व तीर' के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक ला दी थी।
आयोग ने कहा था कि उद्धव ठाकरे व एकनाथ शिंदे गुट शिवसेना के नाम व निशान का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। इसके बाद नए चुनाव चिह्न व नाम के आवंटन के लिए दोनों गुटों को आज तक का समय दिया गया था।
प्रतीक चिन्ह को अंतिम रूप देने के लिए ठाकरे गुट ने दिए तीन प्रतीक
ठाकरे ने रविवार को आयोग से उपचुनाव से पहले तीन चिन्हों (त्रिशूल, जलती हुई मशाल और उगते सूरज) में से एक को अंतिम रूप देने के लिए कहा था। ठाकरे गुट उपचुनाव लड़ रहा है। शिंदे गुट की सहयोगी भाजपा ने उपचुनाव लड़ने का फैसला किया है।
इस उपचुनाव के लिए पर्चा दाखिल करने की आखिरी तारीख 14 अक्तूबर है, इसलिए चुनाव आयोग से दोनों गुटों के लिए वैकल्पिक नामों और चिन्हों पर जल्द ही फैसला आने की संभावना है।
मुखपत्र में चुनाव आयोग और शिंदे पर साधा निशाना
शिवसेना के चिन्ह 'धनुष और तीर' पर अंतरिम रोक लगने के बाद 'सामना' के संपादकीय में कहा गया कि यह एक आग है जिसे कभी बुझाया नहीं जा सकता है। इसमें कहा गया कि यह किसी अन्याय से कम नहीं था।
सामना में आगे कहा गया, यह (चुनाव आयोग का फैसला) दिल्ली का पाप है। बेईमान लोगों ने बेईमानी को अंजाम दिया। लेकिम हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि हम अनगिनत विपदाओं के बावजूद मजबूती से खड़े होंगे।
इसमें आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग ने (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री) एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गद्दारों द्वारा उठाई गई आपत्तियों के कारण बाल ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना को खत्म करने का क्रूर फैसला लिया। इस फैसले से चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र में अंधेरा फैला दिया है। 26 साल पहले बालासाहेब ने मराठी पहचान और मराठी भाषी जनता को न्याय दिलाने के लिए एक आग जलाई थी। लेकिन एकनाथ शिंदे और 40 अन्य गद्दार गुलाम बन गए हैं।