इसमें उन्होंने कहा, मैं भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के कार्यान्वयन के विचार के प्रति तमिलनाडु सरकार के कड़े विरोध को जताने के लिए पत्र लिख रहा हूं जो अपने बहुसांस्कृतिक सामाजिक ताने-बाने के लिए जाना जाता है। उन्होंने कहा, 'मैं कुछ सुधारों की जरूरत को समझता हूं, लेकिन मेरा मानना है कि समान नागरिक संहिता एक गंभीर खतरा है और हमारे समाज के विविध सामाजिक ढांचे को चुनौती देता है।'
उन्होंने कहा कि देश को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने पर गर्व है जो संविधान के अनुच्छेद 29 के माध्यम से अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान और रक्षा करता है। संविधान की छठी अनुसूची यह भी सुनिश्चित करती है कि राज्यों के जनजातीय क्षेत्र, जिला और क्षेत्रीय परिषदों के माध्यम से अपने रीति-रिवाजों और प्रथाओं को संरक्षित करें।
उन्होंने कहा कि यूसीसी अपने स्वभाव से ही ऐसे आदिवासी समुदायों को असमान रूप से प्रभावित कर सकती है और उनकी पारंपरिक प्रथाओं, रीति-रिवाजों और पहचानों का पालन करने और संरक्षित करने के उनके अधिकार को कमजोर कर सकती है। इसके अलावा, हमारे समाज में मौजूद सामाजिक आर्थिक असमानताओं पर विचार किए बिना एक समान संहिता लागू करने के प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विभिन्न समुदायों में विकास, शिक्षा और जागरूकता के अलग-अलग स्तर हैं, और सभी के लिए एक समान दृष्टिकोण मौजूदा असमानताओं को बढ़ा सकता है। यूसीसी में धार्मिक समुदायों के बीच गहरे विभाजन और सामाजिक अशांति पैदा करने की भी क्षमता है। उन्होंने तर्क दिया कि इसके अलावा एक समान संहिता लागू करने के किसी भी प्रयास को धार्मिक मामलों में राज्य द्वारा अतिक्रमण के रूप में माना जा सकता है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भविष्य के लिए एक चिंताजनक मिसाल कायम करता है।
स्टालिन का यह पत्र तब सामने आया है, जब एक दिन पहले उनकी पार्टी द्रमुक ने भी विधि आयोग को इस संबंध में पत्र लिखा और समान नागरिक संहिता के खिलाफ दलील दी। द्रमुक प्रमुख ने अपने पत्र में अपनी पसंद के धर्म को मानने के अधिकार पर संवैधानिक प्रावधानों की ओर इशारा किया। धार्मिक प्रथाएं संबंधित समुदायों के अधिकांश व्यक्तिगत कानूनों का आधार हैं और इसलिए उनमें कोई भी बदलाव धार्मिक समुदायों की सहमति के बिना नहीं किया जा सकता है।