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UAPA: पूर्व रॉ प्रमुख समेत 100 से ज्यादा पूर्व अधिकारियों ने लिखा खत, राजद्रोह कानून की तुलना में यूएपीए ज्यादा कठोर

Sun, 12 Jun 2022 09:50 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

100 से ज्यादा पूर्व अधिकारियों के समूह ने बयान में कहा कि पिछले कुछ सालों में ‘धीरे-धीरे और चुपके से’ राजद्रोह के अपराध गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम में बदलते चले गए। यूएपीए आईपीसी की धारा 124ए की तुलना में अधिक कठोर है।
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Sedition law - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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सौ से ज्यादा पूर्व अधिकारियों ने एक खत में यूएपीए कानून को राजद्रोह कानून की तुलना में ज्यादा कठोर बताया है। इन अधिकारियों का कहना है कि यूएपीए के तहत गैरकानूनी गतिविधियों के अपराधीकरण को बनाए रखते हुए आईपीसी की धारा 124ए को खत्म करने से केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ताधारी पार्टी को मजबूत राजनीतिक लाभ होगा। 
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राजद्रोह कानून को निलंबित किए जाने के करीब एक महीने बाद पूर्व रॉ प्रमुख एएस दौलत, पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर, पूर्व सीआईसी वजाहत हबीबुल्ला, पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई, सिक्किम के पूर्व डीजीपी अविनाश मोहनने ओर पूर्व अतिरिक्त सचिव राणा बनर्जी समेत 108 पूर्व अधिकारियों ने कहा है कि यूएपीए राजद्रोह की तुलना में अधिक सख्त है। 

ये सभी पूर्व अधिकारी सांविधानिक आचरण समूह (सीसीजी) का हिस्सा हैं। समूह खुद को गैर राजनीतिक बताता है। इसने एक खुले खत में सुझाव दिया कि सुप्रीम कोर्ट को ‘संविधान की मूल संरचना’ के सिद्धांत के तहत अनुच्छेद 19 के उन सभी मौजूदा कानूनों और प्रावधानों की समीक्षा करनी चाहिए जो अभिव्यक्ति की आजादी और भाषण पर रोक लगाते हैं। 
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सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को राजद्रोह कानून पर रोक लगा दी थी। साथ ही केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि अब इसके तहत नए मामले दर्ज नहीं होंगे और पुराने मामलों में भी लोग अदालत में जाकर राहत की अपील कर सकते हैं। 

समूह ने बयान में कहा कि पिछले कुछ सालों में ‘धीरे-धीरे और चुपके से’ राजद्रोह के अपराध गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम में बदलते चले गए। यूएपीए आईपीसी की धारा 124ए की तुलना में अधिक कठोर है। 
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समूह ने कहा कि इस मामले में कोई भी राजनीतिक दल बेदाग नहीं है और हर राजनीतिक दल की सरकार मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी को रौंद रही है।
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