इंडियन एसोसिएसन ऑफ प्राइवेट साइकियेट्री के जनरल सेक्रेटरी डॉक्टर राजीव मेहता के अनुसार किसी विपरीत स्थिति में चिंता होना स्वाभाविक है। लेकिन जब यह चिंता अस्वाभाविक व्यवहार में बदलने लगे तो परिवार के अन्य लोगों या करीबियों को सावधान हो जाना चाहिए।
जैसे भीड़ में जाने से कोरोना फैलने का खतरा बढ़ जाता है, यह हम सभी जानते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति के अंदर भीड़ से संक्रमित होने का यही डर इतना ज्यादा बढ़ जाए कि वह वैक्सीन सेंटर पर जाने से भी मना करने लगे तो यह असामान्य व्यवहार बढ़ी एंग्जायटी का संकेत हो सकता है।
बार-बार हाथ धोने जैसी प्रक्रिया को यदि कोई कई बार दोहराना शुरू कर दे, या संक्रमण के डर से लोगों से बिलकुल ही मिलना-जुलना छोड़ दे तो यह भी बढ़ी एंग्जायटी का संकेत हो सकता है। किसी की बातों में घबराहट दिखाई देने लगे तो भी यह एंग्जायटी लेवल के बढ़ने का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में देर करना बिलकुल भी सही नहीं है।
डॉ. राजीव मेहता बताते हैं कि ऐसे मरीजों का ईको टेस्ट (हृदय गति की सही स्थिति जानने के लिए) कराना आवश्यक होता है। अगर हृदय गति सामान्य है, लेकिन इसके बाद भी घबराहट हो रही है तो यह बढ़ते एंग्जायटी लेवल का स्पष्ट संकेत है। ऐसे मरीज को तत्काल मानसिक चिकित्सक को दिखाना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि नकारात्मक सोच वाले लोगों और टीवी या सोशल मीडिया की भड़काऊ नकारात्मक खबरों से दूर रहना चाहिए।
जानकारों का कहना है इस तरह के किसी खतरे से बचे रहने के लिए उन लोगों से संपर्क बढ़ाना चाहिए जिनके मिलने या जिनसे बात करने पर हमें खुशी महसूस होती है। बच्चों के साथ खेलना, मन पसंद भोजन बनाना, खाना, गाना, नाचना, पुस्तकें पढ़ना या रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होना एंग्जायटी लेवल को घटाने में बहुत मददगार साबित होता है।