ULFA Peace Deal: उल्फा का गठन अप्रैल 1979 में हुआ था। गठन के बाद से ही इसने 'संप्रभु असम' की मांग शुरू कर दी और बाद में यह विध्वंसक गतिविधियों में शामिल हो गया।
पूर्वोत्तर में शांति की दिशा में शुक्रवार को बड़ा फैसला लिया गया। असम के अलगाववादी गुट यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी उल्फा से केंद्र और असम सरकार ने त्रिपक्षीय शांति समझौता किया। यह समझौता राजधानी दिल्ली में हुई एक बैठक में हुआ। इस बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे। इस दौरान अमित शाह ने कहा कि यह एक बेहद सुखद पल है।
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आखिर क्या है उल्फा? उल्फा का इतिहास क्या है? अब जो त्रिस्तरीय समझौता हुआ है वो क्या है? इसके मायने क्या हैं? पहले कब-कब समझौते की कोशिशें की गईं? उनका क्या नतीजा रहा? आइये जानते हैं...
आखिर क्या है उल्फा?
उल्फा का गठन अप्रैल 1979 में हुआ था, उस वक्त के पूर्वी पाकिस्तान आज के बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों के खिलाफ आंदोलन के बाद इस गुट का जन्म हुआ था। ऊपरी असम के जिलों के 20 युवाओं के एक समूह ने 7 अप्रैल, 1979 को शिवसागर के ऐतिहासिक अहोम-युग के एम्फीथिएटर रंग घर में उल्फा की शुरुआत की थी। गठन के बाद से इस संगठन ने 'संप्रभु असम' की मांग शुरू कर दी। बाद में यह विध्वंसक गतिविधियों में शामिल हो गया। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने 1990 में इसे प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया।
सुरक्षा बलों ने उल्फा (आई) के 3 कैडरों को पकड़ा
- फोटो : ANI
1992 में पहली बार बंटा गुट
1992 में नेताओं और कैडरों के एक वर्ग द्वारा बातचीत की इच्छा व्यक्त करने के साथ यह संगठन बंट गया था। हालांकि, अरबिंद राजखोवा और परेश बरुआ दोनों तब 'संप्रभुता' वाली मांग पर दृढ़ थे। बातचीत की इच्छा रखने वालों ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और खुद को सल्फा के रूप में संगठित किया। इस गुट ने 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में राज्य में जबरदस्त प्रभाव डाला।
2011 में दूसरी बार अलगाववादी गुट के दो टुकड़े हुए
फरवरी 2011 में यह गुट फिर दो भाग में बंट गया। तब अरबिंद राजखोवा के नेतृत्व वाले गुट ने हिंसा छोड़ दी थी। यह गुट बिना शर्त सरकार के साथ बातचीत के लिए सहमत हो गया। वार्ता समर्थक गुट ने असम के मूल निवासियों की जमीन के अधिकार समेत उनकी पहचान और संसाधनों की सुरक्षा के लिए सुधारों की मांग की। यह गुट चीन-म्यांमार सीमा के पास एक जगह पर रहता है। वहीं, दूसरे उल्फा गुट का नेतृत्व करने वाले परेश बरुआ बातचीत के खिलाफ था। 2011 में जब गुट का बंटवारा हुआ तब भी यही वजह बनी थी। ताजा समझौता भी राजखोवा गुट के साथ ही हुआ है।
अमित शाह के साथ असम के मुख्यमंत्री सरमा
- फोटो : सोशल मीडिया
अभी क्या हुआ है?
राजधानी दिल्ली में शुक्रवार को हुई बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और अरबिंद राजखोवा की अध्यक्षता वाले उल्फा के वार्ता समर्थक गुट के एक दर्जन से अधिक शीर्ष नेता शांति समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान उपस्थित रहे।
जानकारी के अनुसार, राजखोवा समूह के दो शीर्ष नेता अनूप चेतिया और शशधर चौधरी पिछले सप्ताह से दिल्ली में हैं और सरकार के वार्ताकारों के साथ शांति समझौते को अंतिम रूप दिया। सरकार की ओर से जो लोग उल्फा गुट से बात कर रहे थे उनमें इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक तपन डेका और पूर्वोत्तर मामलों पर सरकार के सलाहकार एके मिश्रा शामिल हैं।
असम के सीएम
- फोटो : सोशल मीडिया
समझौते के मायने क्या हैं?
वार्ता के दौरान मौजूद रहे अधिकारियों ने कहा कि इस समझौते का लक्ष्य पूर्वोत्तर में दशकों पुराने उग्रवाद को समाप्त करना है। इस समझौते से असम के चार दशक लंबे उल्फा विद्रोह खत्म हो सकता है।
इससे पहले इस विद्रोह ने असम में लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। उल्फा शुरू में एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही इसने अपहरण, जबरन वसूली, हत्याओं और बम विस्फोटों के साथ सशस्त्र संघर्ष का रूप ले लिया। इस बीच कई विवादास्पद मुद्दे थे जिनका शांति बहाली के लिए समाधान आवश्यक था।
अब तक परेश बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा (इंडेपेंडेंट) गुट के बातचीत के लिए तैयार नहीं होने के बावजूद, यह समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। 1991 के बाद से संगठन के साथ बातचीत के कई प्रयासों के बावजूद, कोई समाधान नहीं निकला। ऐसे में शुक्रवार का समझौता ऐतिहासिक है।
उल्फा ने कई मौकों पर बातचीत की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन 'संप्रभुता' पर अपने रुख पर अड़ा रहा था। 2011 में संगठन के विभाजन के बाद ही अध्यक्ष अरबिंद राजखोवा सहित शीर्ष नेतृत्व पड़ोसी देश से असम लौटा, जिसके बाद वे संप्रभुता वाली मांग के बिना बातचीत की मेज पर आने के लिए सहमत हुए।
हिमंता सरकार के बाद तेज हुई वार्ता
केंद्र और उल्फा (वार्ता समर्थक) गुट के साथ समय-समय पर बातचीत होती रही, उल्फा ने 2012 में सरकार को 12 सूत्री मांगों का चार्टर सौंपा था। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 2021 में पदभार संभालने के बाद इस समझौते के लिए दिल्ली तक पहल की। केंद्र ने इस साल अप्रैल में वार्ता समर्थक गुट को प्रस्तावित समझौते का मसौदा भेजा। वहीं, अगस्त में नई दिल्ली में गुट के साथ चर्चा का एक और दौर आयोजित किया गया था। अक्तूबर में वार्ता समर्थक गुट ने मसौदा प्रस्तावों के संबंध में अपने सुझाव केंद्र को भेजे थे। शुक्रवार को अंततः समझौता पूरा हो गया।