पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की घटनाओं की जांच में जुटी है सीबीआई।
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बंगाल में हिंसा का इतिहास क्या?
1950 के आखरी दशक से शुरू हुई हिंसा पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक अभिन्न अंग रही है। राज्य के बारे में कहा जाता है कि जब भी यहां सत्तारुढ़ दल को किसी विपक्षी पार्टी से कड़ी चुनौती मिलने लगती है तो हिंसा की घटनाएं तेज हो जाती हैं।
1959 का खाद्य आंदोलन और साठ के दशक की शुरुआत में छात्र आंदोलन भी हिंसक हो गया था। खाद्य आंदोलन के दौरान अंतर-पार्टी संघर्ष और पुलिस कार्रवाई में 80 लोगों की मौत हुई थी।
स्वतंत्रता पूर्व अवधि के दौरान बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था। फिर विभाजन के दौरान हिंसा, उसके बाद तेभागा आंदोलन और साठ के दशक में नक्सली आंदोलन ने यहां हिंसा बढ़ाने के लिए ट्रिगर के रूप में काम किया।
नक्सली आंदोलन से सैनबाड़ी हत्याकांड तक
चारु मजूमदार के नेतृत्व में 1967 के उग्र नक्सली आंदोलन ने बंगाल को अस्त-व्यस्त कर दिया था। इस दौरान सैंकड़ों हत्याएं हुईं। 70 के दशक में फारवर्ड ब्लॉक नेता हेमंत बसु व अजीत कुमार विश्वास की नृशंस हत्या कर दी गई।
राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर एक और धब्बा 1970 का सैनबाड़ी हत्याकांड था, जिसमें क्रूरता की सारी हदें पार हो गई थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस के प्रति निष्ठा रखने वाले भाइयों को वामपंथियों के कथित समर्थकों ने काट दिया गया था और कथित तौर पर उनकी मां को उनके बेटों के खून से सने चावल खाने पर मजबूर किया गया था।
पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु
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पश्चिम बंगाल में मतदान से पहले कई इलाकों में हिंसा की खबरें (फाइल फोटो)
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पश्चिम बंगाल में वोटिंग के दौरान हिंसा (फाइल फोटो)
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