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बंगाल में खूनी संघर्ष: अक्सर राज्य में हिंसा क्यों भड़क जाती है, ऐसी बड़ी घटनाओं का इतिहास क्या?

Tue, 22 Mar 2022 07:39 PM IST
प्रतिभा ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

बंगाल सरकार ने हिंसा की जांच के लिए एक विशेष जांच दल का गठन किया है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने हिंसा की निंदा की है और कहा है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था चरमरा गई है।
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बंगाल में फिर हिंसा - फोटो : ANI
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विस्तार
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पश्चिम बंगाल के बीरभूम में टीएमसी नेता और उपप्रधान भादू शेख की हत्या के बाद सोमवार देर रात हिंसा भड़क गई। यहां भीड़ ने 10-12 घरों के दरवाजे को बंद कर आग लगा दी। एक ही घर से 7 लोगों के शव निकाले गए हैं। भड़की हिंसा में अब तक कुल 10 लोगों की मौत हो गई है। जानकारी के मुताबिक बंगाल के बीरभूम जिले के रामपुरहाट में टीएमसी के उपप्रधान की हत्या का बदला लेने के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया है।
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इस घटना के आरोपी 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। बंगाल सरकार ने हिंसा की जांच के लिए एक विशेष जांच दल का गठन किया है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने हिंसा की निंदा की है और कहा है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था चरमरा गई है।

राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने अपना एक वीडियो ट्वीट करके उन्होंने लिखा कि भयानक हिंसा और आगजनी की घटना संकेत दे रही है कि राज्य हिंसा की संस्कृति और जंगलराज के हवाले है। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि वह 72 घंटों में बीरभूम की घटना की रिपोर्ट राज्य सरकार से मांगेंगे। इसके बाद एक टीम कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा करने के लिए वहां जाएगी।
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विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद भी हिंसा भड़की थी
इससे पहले बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद हिंसा भड़की थी। कथित तौर पर जैसे ही रुझान आने लगे और तृणमूल कांग्रेस पार्टी भारी अंतर से भाजपा को हराते हुए दिखने लगी, तृणमूल कार्यकर्ताओं पर मारकाट, आगजनी, हत्या और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने के आरोप लगने लगे। पूरे चुनावी नतीजे आने तक बंगाल से करीब एक दर्जन लोगों के मारे जाने की खबर आ गई। मामला मानवाधिकार आयोग से होते हुए कोलकता उच्च न्यायालय तक पहुंचा और कोर्ट ने इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश तक दिए।

हालांकि सोमवार की घटना में पुलिस और तृणमूल कांग्रेस दोनों ने घटनाओं के पीछे राजनीतिक मंशा से इनकार किया है, लेकिन राज्य में हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है।

पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की घटनाओं की जांच में जुटी है सीबीआई। - फोटो : PTI
बंगाल में हिंसा का इतिहास क्या?
1950 के आखरी दशक से शुरू हुई हिंसा पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक अभिन्न अंग रही है। राज्य के बारे में कहा जाता है कि जब भी यहां सत्तारुढ़ दल को किसी विपक्षी पार्टी से कड़ी चुनौती मिलने लगती है तो हिंसा की घटनाएं तेज हो जाती हैं।

1959 का खाद्य आंदोलन और साठ के दशक की शुरुआत में छात्र आंदोलन भी हिंसक हो गया था। खाद्य आंदोलन के दौरान अंतर-पार्टी संघर्ष और पुलिस कार्रवाई में 80 लोगों की मौत हुई थी।

स्वतंत्रता पूर्व अवधि के दौरान बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था। फिर विभाजन के दौरान हिंसा, उसके बाद तेभागा आंदोलन और साठ के दशक में नक्सली आंदोलन ने यहां हिंसा बढ़ाने के लिए ट्रिगर के रूप में काम किया।





नक्सली आंदोलन से सैनबाड़ी हत्याकांड तक
चारु मजूमदार के नेतृत्व में 1967 के उग्र नक्सली आंदोलन ने बंगाल को अस्त-व्यस्त कर दिया था। इस दौरान सैंकड़ों हत्याएं हुईं। 70 के दशक में फारवर्ड ब्लॉक नेता हेमंत बसु व अजीत कुमार विश्वास की नृशंस हत्या कर दी गई।

राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर एक और धब्बा 1970 का सैनबाड़ी हत्याकांड था, जिसमें क्रूरता की सारी हदें पार हो गई थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस के प्रति निष्ठा रखने वाले भाइयों को वामपंथियों के कथित समर्थकों ने काट दिया गया था  और कथित तौर पर उनकी मां को उनके बेटों के खून से सने चावल खाने पर मजबूर किया गया था।

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु - फोटो : Amar Ujala
 28 हजार राजनीतिक हत्याएं हुईं
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक1997 में तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार ने विधानसभा में यह बात स्वीकार की थी कि 1977 में वाम मोर्चे की सरकार बनने के बाद से राज्य में 28 हजार राजनीतिक हत्याएं हुई थीं। 1979 में मरीचझापी द्वीप नरसंहार हुआ।

1980 और 1990 के दशक में जब बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस औऱ भाजपा को कोई नामो-निशान नहीं था, अक्सर वाम मोर्चा और कांग्रेस के बीच हिंसा होती रहती थी।

1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु की सरकार ने विधानसभा में पेश आंकड़ों में कहा था कि 1988-89 के दौरान राजनीतिक हिंसा में 86 कार्यकर्ताओं की मौत हुई। उनमें से 34 माकपा के थे और 19 कांग्रेस के, बाकी अन्य कार्यकर्ता थे।

हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं
वर्ष 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 50 हत्याएं 2009 में हुईं। उस साल अगस्त में माकपा ने एक पर्चा जारी कर दावा किया था कि दो मार्च से 21 जुलाई के बीच तृणमूल कांग्रेस ने उसके 62 काडर की हत्या कर दी है। 

पश्चिम बंगाल में मतदान से पहले कई इलाकों में हिंसा की खबरें (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
टीएमसी-भाजपा में संघर्ष बढ़ा
2014 के चुनावों के बाद भाजपा ने बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करनी शुरू की। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष बढ़ना शुरू हुआ

2019  में पश्चिम बंगाल राजनीतिक हत्याओं के मामले में देश में शीर्ष पर रहा। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पूरे साल के दौरान देश में होने वाली 54 राजनीतिक हत्याओं में से 12 बंगाल में हुईं। लेकिन, उसी साल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को जो एडवायजरी भेजी थी, उसमें कहा गया कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा में 96 हत्याएं हुई हैं।

वर्ष 2018 के पंचायत चुनावों में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, कम से कम 50 लोगों की हत्या हुई थी। भाजपा नेताओं का दावा रहा कि साल 2018 के पंचायत चुनाव से लेकर 2021 तक उसके करीब सौ कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। वहीं टीएमसी का कहना है कि उसके इससे भी ज्यादा कार्यकर्ताओं की जान गई है। हालांकि,  भाजपा के आरोप पर तृणमूल कांग्रेस कहती रही है कि भाजपा नेताओं की हत्या के पीछे आपसी रंजिश और पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी जिम्मेदार है।
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पश्चिम बंगाल में वोटिंग के दौरान हिंसा (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
हिंसा की वजह क्या?    
माना जाता है कि अक्सर विभिन्न राजनीतिक दल अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए और अपना संघर्ष जारी रखने के लिए भी ऐसा करते हैं। यह सिलसिला वाम मोर्चा और उससे पहले कांग्रेस की सरकार के दौर में जारी रहा है। 

बेरोजगारी, गरीबी, राजनीतिक दलों पर अत्यधिक निर्भरता, जमीनी स्तर पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं में कटुता भी इसकी एक वजह मानी जाती है।  किसी एक दल का बहुत लंबे समय तक प्रभुत्व समस्या के मूल कारणों में से एक माना जाता है।

एक्सपर्ट मानते हैं कि राजनीतिक दबदबा कायम करने के लिए भी  यही तरीका अपनाया जाता रहा है। हिंसा राज्य में राजनीतिक पकड़ बनाने का एक जरिया भी है।
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