देश के अस्पतालों में सुपरबग संक्रमण का इलाज कराने वाले मरीजों की राह काफी मुश्किल होती दिखाई दे रही है। महंगी दवाओं और लंबे समय तक आईसीयू में रुकने की वजह से इनका खर्च बढ़ रहा है, जिसके चलते परिजनों को उधार लेना पड़ रहा है। यहां तक कि मकान बेचने की नौबत तक आ रही है।
नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अध्ययन में यह सामने आया है। इसमें निष्कर्ष निकाला गया है कि सरकारी अस्पतालों में भी इसका इलाज लेने के लिए मरीजों को हर दिन चार से पांच हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह सुपरबग के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का महंगा होना है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल बीएमजे ओपन में प्रकाशित इस अध्ययन में आईसीएमआर ने देश के आठ बड़े सरकारी, निजी अस्पतालों सहित करीब 12 चिकित्सा संस्थानों को शामिल किया।
हर दूसरे मरीज पर आर्थिक बोझ
शोधकर्ताओं ने पाया कि 46.5 फीसदी मरीजों को इलाज पूरा करने के लिए उधार लेना पड़ा या फिर अपनी संपत्ति बेचनी पड़ गई। इसका मतलब है कि लगभग हर दूसरा मरीज सुपरबग के चलते स्वास्थ्य के साथ साथ आर्थिक बोझ से भी दब रहा है।
आईसीयू में रहने की नौबत
अध्ययन के अनुसार, एक मरीज को सुपरबग की चपेट में आने के बाद सामान्य इलाज के साथ-साथ संक्रमण रोधी दवाओं पर भी खर्च करना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में यह खर्च कम से कम 17 से 20 हजार रुपये हो सकता है, जबकि निजी अस्पताल में यह दो से तीन लाख रुपये होने का अनुमान है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि मरीज को महंगी दवाएं लेनी पड़ती हैं और उन्हें कुछ दिन ज्यादा गहन चिकित्सा देखभाल यानी आईसीयू में रहना पड़ता है।
ऐसे मरीजों को बना रहा कर्जदार
शोधकर्ताओं ने अध्ययन के लिए 1,723 रोगियों का चिकित्सा इतिहास और 170 मरीजों से बातचीत को शामिल किया। आईसीएमआर की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कामिनी वालिया के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में एंटरोबैक्टीरियासी के 53.9%, एसिनेटोबेक्टर के 43.8% और स्टैफिलोकोकस के 49.7% मामलों में मरीजों को सबसे ज्यादा इलाज पर खर्च करना पड़ा और वे कर्जदार हो गए।
सामान्य संक्रमण का इलाज इतना महंगा नहीं
डॉ. वालिया के मुताबिक, भारत में संक्रमण के इलाज का खर्च आमतौर पर बहुत अधिक महंगा नहीं है, लेकिन यह संक्रमण अगर दवा प्रतिरोधी रोगजनक या फिर कहें कि किसी सुपरबग के कारण हो तो उसका खर्च बहुत अधिक हो सकता है। इस अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध इस हद तक बढ़ गया है कि लोगों को इलाज की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागत का भुगतान करने के लिए पैसे उधार लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
कर्ज न लें, इसलिए भोजन की कटौती की
कुछ एंटीबायोटिक प्रतिरोधी संक्रमणों का इलाज करने के लिए निजी अस्पतालों में अतिरिक्त 10.6% खर्च करना पड़ रहा है। यदि सुपरबग सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं की वजह से पैदा हुए हैं तो डॉक्टरों को नई दवा इस्तेमाल करनी पड़ रही हैं क्योंकि पुरानी दवाएं मरीज के लिए अब बेअसर हैं। अध्ययन में 33.1% मरीज ऐसे मिले हैं, जिन्होंने अपनी सेविंग यानी बचत को खत्म करके इलाज का भुगतान किया, जबकि कुछ परिवारों ने खर्च को देखते हुए अपने भोजन की खपत तक कम कर दी।