संदूक, दरवाजे या अलमारियों में ताले लगाने की बात तो समझ में आती है। यहां तक कि फिल्म ‘टार्जन : द वंडर कार’ में कार को जंजीरों से बांधे जाने के सीन से भी हम परिचित हैं। लेकिन ट्रेनों में ताले लगाने की बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है। हालांकि यह सच है, इटावा जिले के सरायभूपत स्टेशन पर रुकने वाली ट्रेनों को जंजीरों से बांध कर रखा जाता है। यह रवायत अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। खास बात यह है कि इसके लिए बाकायदा एक कर्मचारी की ड्यूटी लगाई जाती है।
दरअसल अंग्रेजों के शासनकाल में नियम बनाया गया कि अगर कोई ट्रेन एक दिन के लिए भी स्टेशन पर रुकती है तो उसके किसी एक पहिए को जंजीर से बांधकर उसमें ताला लगाकर सुरक्षित किया जाए। अन्य स्टेशनों पर समय के साथ यह नियम भले ही बदल गया हो, लेकिन इटावा के सराय भूपत स्टेशन पर आज भी इस नियम का कड़ाई से पालन किया जाता है।
यहां रुकने वाली सवारी गाड़ी हो या फिर 120 बोगियों की लगभग आधा किलोमीटर लंबी मालगाड़ी। सभी में स्टेशन अधीक्षक या स्टेशन मास्टर की निगरानी में पोर्टर किसी एक पहिए को जंजीर से पटरियों से बांधकर ताला लगाता है। यही नहीं उस पहिए के दोनों ओर दो लकड़ी की गिट्टकें भी लगाते हैं। इस काम की बाकायादा लिखत पढ़त होती है और स्टेशन मास्टर कक्ष में रखे स्टेबल रजिस्टर में इसे दर्ज किया जाता है।