बाहर का मंजर देखकर वेंक्टेश चिल्लाया
वेंक्टेश ने मुश्किल से अपनी बोगी का दरवाजा खोला। वह नीचे उतरा तो अवाक रह गया। चारों तरफ से लोगों की चीख पुकार सुनाई पड़ रही थी। बाहर का मंजर देखकर वेंक्टेश चिल्लाया। कई बोगियां पलटी पड़ी थीं। उन्होंने सबसे पहले अपने इंस्पेक्टर को फोन किया। इसके बाद इंस्पेक्टर ने अपने कमांडर को हादसे की जानकारी दी। तुरंत हेडक्वार्टर को सूचित किया गया।
वेंक्टेश से उसके कमांडर ने पूछा, तुम ठीक हो। कमांडर के यहां से हेडक्वार्टर को ज्यादा बेहतर तरीके से हादसे की जानकारी दी जा सकी। वेंक्टेश ने अपने मोबाइल फोन की लाइट जलाई और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया। निकट ही एक बोगी से महिलाओं और बच्चों की आवाज आ रही थी। उन्होंने कुछ ग्रामीणों को साथ लिया और बोगी से यात्रियों को बाहर निकालने का प्रयास किया। कुछ बोगियां ऐसी थीं, जिनके दरवाजे नहीं खुल रहे थे। उसके लिए लोगों ने लोहे की छड़ों व डंडों का सहारा लिया।
जब रक्षक बन गए आसपास के ग्रामीण
बतौर वेंक्टेश, घटना स्थल पर सबसे पहले आसपास के लोग पहुंचे थे। उनके हाथों में मोबाइल फोन थे। वहां पर रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस वजह से रेस्क्यू ऑपरेशन में दिक्कत हुई। हालांकि जब वहां पर एनडीआरएफ टीमें पहुंचीं, तो वे अपने लाइट सिस्टम से लैस थीं। अन्य सुरक्षा बलों ने भी वहां पर लाइट टावर लगा दिए थे। आसपास के लोग रक्षक बने हुए थे। वे गाड़ी के डिब्बे खोलने का प्रयास कर रहे थे। जैसे ही वे किसी एक बोगी का दरवाजा खोलने के लिए जुटते तो दूसरी बोगी से लोगों के चिल्लाने की आवाज आने लगती। रात 12 बजे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चरम पर था। उस वक्त तक कटर आ चुके थे। दरवाजे काटकर यात्रियों के शव निकाले गए। घटना स्थल पर मौजूद एनडीआरएफ कमांडेंट जैकब का कहना है, दोपहर तक रेस्क्यू ऑपरेशन समाप्त हो जाएगा। हर एक बोगी को चेक किया जा रहा है। जहां भी कोई बॉडी फंसी है, उस बोगी को काटा जा रहा है। एनडीआरएफ ने करीब चार दर्जन लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है।