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Train Accident: कोरोमंडल एक्सप्रेस में सवार था NDRF जवान, मोबाइल की लाइट में खुद शुरू किया रेस्क्यू ऑपरेशन

सार

Train Accident: स्टेट एनडीआरएफ को इस हादसे की जो सूचना मिली, उसका सूत्रधार वेंक्टेश ही था। उन्होंने अपने इंस्पेक्टर को बताया और वहां से वह सूचना बड़े अधिकारियों तक पहुंची। इसके चलते स्टेट एनडीआरएफ समय रहते घटना स्थल पर पहुंच गई...
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सिपाही वेंक्टेश - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar
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विस्तार
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ओडिशा में हुए ट्रेन हादसे में मृतकों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। यह संख्या 280 के पार हो गई है। घायलों की संख्या करीब एक हजार बताई जा रही है। जब ये भयावह हादसा हुआ, तो उस वक्त सबसे पहले किसने यात्रियों की मदद की। घटना स्थल पर लगभग डेढ़ घंटे तक रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी। एनडीआरएफ का एक जवान वेंक्टेश, जो हावड़ा से कोरोमंडल एक्सप्रेस में सवार हुआ था, वह इस हादसे में बाल-बाल बच गया। हालांकि उसे कुछ चोटें आई, लेकिन वे ज्यादा गंभीर नहीं थी। उसने मोबाइल की रोशनी में क्षतिग्रस्त ट्रेन के डिब्बों से कई बच्चों को बाहर निकाला। अपनी यूनिट को सूचना दी। स्टेट एनडीआरएफ को इस हादसे की जो सूचना मिली, उसका सूत्रधार वेंक्टेश ही था। उन्होंने अपने इंस्पेक्टर को बताया और वहां से वह सूचना बड़े अधिकारियों तक पहुंची। इसके चलते स्टेट एनडीआरएफ समय रहते घटना स्थल पर पहुंच गई। घटना स्थल पर एनडीआरएफ की 9 टीमें लगी हैं। इनमें लगभग 250-300 जवान शामिल हैं।

वेंक्टेश बोले- जैसे कोई विस्फोट हुआ है

एनडीआरएफ के जवान वेंक्टेश को एक माह की छुट्टी मिली थी। वह अपने घर नायक पट्टी तेजावर जिला, तमिलनाडु जाने के लिए शुक्रवार को हावड़ा से कोरोमंडल एक्सप्रेस में सवार हुआ था। वह ट्रेन की बोगी बी7 की 68 नंबर सीट पर बैठा था। यह हादसा शाम साढ़े छह बजे के आसपास हुआ था। उसकी बोगी में सवार अधिकांश लोग अपने मोबाइल फोन पर व्यस्त थे। एकाएक तेज आवाज के साथ जोर का झटका लगा। यात्रियों के हाथ से फोन नीचे गिर पड़े। सामान भी इधर-उधर बिखर गया। वेंक्टेश बताते हैं, चूंकि वह दिन ढलने का समय था, इसलिए ज्यादा कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक बार तो यह लगा कि जैसे कोई विस्फोट हुआ है।

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Odisha Train Accident - फोटो : Amar Ujala
बाहर का मंजर देखकर वेंक्टेश चिल्लाया

वेंक्टेश ने मुश्किल से अपनी बोगी का दरवाजा खोला। वह नीचे उतरा तो अवाक रह गया। चारों तरफ से लोगों की चीख पुकार सुनाई पड़ रही थी। बाहर का मंजर देखकर वेंक्टेश चिल्लाया। कई बोगियां पलटी पड़ी थीं। उन्होंने सबसे पहले अपने इंस्पेक्टर को फोन किया। इसके बाद इंस्पेक्टर ने अपने कमांडर को हादसे की जानकारी दी। तुरंत हेडक्वार्टर को सूचित किया गया।

वेंक्टेश से उसके कमांडर ने पूछा, तुम ठीक हो। कमांडर के यहां से हेडक्वार्टर को ज्यादा बेहतर तरीके से हादसे की जानकारी दी जा सकी। वेंक्टेश ने अपने मोबाइल फोन की लाइट जलाई और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया। निकट ही एक बोगी से महिलाओं और बच्चों की आवाज आ रही थी। उन्होंने कुछ ग्रामीणों को साथ लिया और बोगी से यात्रियों को बाहर निकालने का प्रयास किया। कुछ बोगियां ऐसी थीं, जिनके दरवाजे नहीं खुल रहे थे। उसके लिए लोगों ने लोहे की छड़ों व डंडों का सहारा लिया।

जब रक्षक बन गए आसपास के ग्रामीण

बतौर वेंक्टेश, घटना स्थल पर सबसे पहले आसपास के लोग पहुंचे थे। उनके हाथों में मोबाइल फोन थे। वहां पर रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस वजह से रेस्क्यू ऑपरेशन में दिक्कत हुई। हालांकि जब वहां पर एनडीआरएफ टीमें पहुंचीं, तो वे अपने लाइट सिस्टम से लैस थीं। अन्य सुरक्षा बलों ने भी वहां पर लाइट टावर लगा दिए थे। आसपास के लोग रक्षक बने हुए थे। वे गाड़ी के डिब्बे खोलने का प्रयास कर रहे थे। जैसे ही वे किसी एक बोगी का दरवाजा खोलने के लिए जुटते तो दूसरी बोगी से लोगों के चिल्लाने की आवाज आने लगती। रात 12 बजे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चरम पर था। उस वक्त तक कटर आ चुके थे। दरवाजे काटकर यात्रियों के शव निकाले गए। घटना स्थल पर मौजूद एनडीआरएफ कमांडेंट जैकब का कहना है, दोपहर तक रेस्क्यू ऑपरेशन समाप्त हो जाएगा। हर एक बोगी को चेक किया जा रहा है। जहां भी कोई बॉडी फंसी है, उस बोगी को काटा जा रहा है। एनडीआरएफ ने करीब चार दर्जन लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है।

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