केंद्र ने वैक्सीन पॉलिसी में भेदभाव किया
अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी. श्रीकुमार के मुताबिक, कोरोना के लॉकडाउन में केंद्र सरकार की गलत नीतियों का खामियाजा सभी को भुगतना पड़ रहा है। एकाएक लगाए जा रहे लॉकडाउन के कारण लोग घरों से बाहर जाने को मजबूर हैं। वजह, उनके सामने जीवन का संकट है। इस तरह के फैसले से लाखों-करोड़ों लोगों का रोजगार खत्म हो जाता है। केंद्र सरकार ने बतौर फ्रंटलाइन वर्कर, जिनमें आंगनवाड़ी वर्कर, आशा और सैनिटाइजर वर्कर शामिल हैं, उन्हें झूठा आश्वासन दे दिया है। ये सभी वर्कर कोविड 19 के सर्वे में लगे हुए हैं। सरकार ने इन्हें मुआवजा देने की बात कही थी।
चिट्ठी में लिखा है, केंद्र सरकार के पास कोरोना से निपटने के लिए कोई मजबूत प्लान नहीं है। नियमों में कठोरता का अभाव है। हर तरह की प्लानिंग में भेदभावपूर्ण नीतियां सामने आ रही हैं। गैर-भाजपा सरकारों पर सहयोग न करने का आरोप लगाया जा रहा है। सच्चाई यह है कि भेदभावपूर्ण खेल तो स्वयं केंद्र की तरफ से खेला जा रहा है। कोरोना काल में जब केंद्र सरकार को देश की एकता के लिए अति सक्रियता दिखानी चाहिए थी, वह नहीं दिखाई दी।
चिट्ठी के मुताबिक, केंद्र ने वैक्सीन पॉलिसी में भी भेदभाव बरता है। लोगों के जीवन के मुकाबले, कॉरपोरेट घरानों का हित साधने का प्रयास किया गया है। सरकार को एक समय सीमा में सभी लोगों को वैक्सीन लगाने की नीति बनानी चाहिए थी। सरकार ने इस तरफ ध्यान देने की बजाए अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया का ख्याल रखा। वैक्सीन की कीमतों के निर्धारण के मामले में सरकार पूरी तरह फेल रही। भारतीय अस्पतालों में 600 रुपये से 1200 रुपये का रेट तय कर दिया, जबकि विदेश में यही वैक्सीन सस्ते रेट पर बिक रही है।
यूरोप में कोविशील्ड के 160 रुपये, यूएस में 300, बांग्लादेश में 300, यूके में 226 और ब्राजील में 237 रुपये में ये वैक्सीन मिल जाती है। सीरम इंस्टीट्यूट ने अब राज्यों के लिए इस वैक्सीन का रेट चार सौ से तीन सौ रुपये कर दिया है। पहले यह रेट केंद्र के लिए डेढ़ सौ रुपये, राज्य के लिए चार सौ और प्राइवेट अस्पतालों को छह सौ रुपये था।
भारत बायोटेक ने केंद्र को 150 रुपये, राज्यों को 600 रुपये और प्राइवेट अस्पतालों को 1200 रुपये में कोवैक्सीन देने का रेट तय किया है। ये सब केंद्र सरकार की गलत नीतियों के चलते हो रहा है। दवा की कीमतें निर्धारित करने वाला प्राधिकरण क्या कर रहा है। किसान विरोधी कानून, सीएए, नई शिक्षा नीति और पावर, रक्षा, ट्रांसपोर्ट व दूसरे क्षेत्रों से जुड़े कानूनों को संसद में संख्या बल से पास करा लिया गया। चिट्ठी में इस बात का जिक्र किया गया है कि ये सभी भेदभावपूर्ण कानून रहे हैं।