एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि टायरों के घिसने के कारण माइक्रोप्लास्टिक रूपी छोटे-छोटे कण और पार्टिकुलेट मैटर लोगों की सेहत के लिए धीमे जहर जैसे हैं। इंपीरियल कॉलेज लंदन के ट्रांजिशन टू जीरो पॉल्यूशन इनिशिएटिव के शोधकर्ताओं ने कहा, दुनियाभर में हर साल 60 लाख टन टायरों के घिसने के कारण अत्यंत लघु आकार के छोटे कण निकलते हैं, जो सेहत के साथ-साथ पर्यावरण चार गुना अधिक हानिकारक है।
इसके बावजूद ईंधन उत्सर्जन से निपटने के लिए समर्पित शोध और नवाचारों की तुलना में टायरों के घिसने के कारण पर्यावरण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को संबंधित शोधों में नजरअंदाज कर दिया जाता है। टायर घिसने से होने वाला प्रदूषण इतना खतरनाक है कि यह अन्य माइक्रोप्लास्टिक की तुलना में पर्यावरण के लिए चार गुना अधिक हानिकारक है।
इंपीरियल कॉलेज के डिपार्टमेंट ऑफ लाइफ साइंसेज के शोधकर्ता डॉ. विल पियर्स के अनुसार टायरों के घिसने से निकलने वाले कण हवा में भी समाए होते हैं। सड़कों में बहता पानी जलमार्गों के जरिए जलाशय और खेतों में जाता है, इसलिए यह कृषि पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं। भले ही हमारे सभी वाहन आगे चलकर जीवाश्म ईंधन के बजाय बिजली द्वारा ही क्यों न संचालित हों, फिर भी टायरों के घिसने से उत्सर्जित हानिकारक प्रदूषण वातावरण में घुलता रहेगा।
शोधकर्ताओं ने कहा, इलेक्ट्रिक वाहन महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन चिंता इस बात की है कि इलेक्ट्रिक वाहन भारी होते हैं जो टायरों के घिसने में वृद्धि कर सकते हैं।
80% कम हो सकता है प्लास्टिक प्रदूषण
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण 2040 तक 80% कम हो सकता है। इसके लिए जरूरी है कि प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करने वाले देश और कंपनियां एक परिपत्र अर्थव्यवस्था को मजबूत करें। परिपत्र अर्थव्यवस्था एक आर्थिक प्रणाली है, जिसका उद्देश्य कचरे को कम करना और पुन:उपयोग को बढ़ावा देना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक परिपत्र अर्थव्यवस्था में बदलाव के परिणाम स्वरूप 1.27 ट्रिलियन डॉलर की बचत होगी, जिससे 2040 तक 7 लाख नौकरियों की वृद्धि हो सकती है।
भारत में हर साल पैदा होता है 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा
प्लास्टिक, द पोटेंशियल एंड पॉसिबिलिटीज संबंधी ताजी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रतिवर्ष 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से केवल 30 फीसदी कचरे का ही पुनर्चक्रण (री-साइक्लिंग) किया जाता है।
महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु मिलकर कुल प्लास्टिक कचरे में से 38 फीसदी कचरा पैदा करते हैं। जहां तक महानगरों का सवाल है, सिंगल यूज प्लास्टिक में रोक के बावजूद रोजमर्रा के कामों में प्रतिदिन प्लास्टिक का प्रयोग करने वाले शहरों में दिल्ली सबसे आगे है।
रिपोर्ट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का हवाला देते हुए कहा गया है कि दिल्ली में प्रतिव्यक्ति अपशिष्ट उत्पादन सबसे अधिक है। इसके बाद मुंबई, चेन्नई और कोलकाता का नंबर आता है।