मराठा-पटेल सहित कई जातियों के आरक्षण की मांग से बढ़ी समस्या का निपटारा मोदी सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था से कर सकती है। सरकार में उच्च स्तर पर आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए 15 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था करने पर माथापच्ची हो रही है।
इसके लिए आरक्षण का दायरा बढ़ाने ( 50 फीसदी से ज्यादा करने) के बारे में कानूनी राय भी ली गई है। अगर सहमति बनी तो सरकार संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में इसके लिए संविधान संशोधन का सहारा ले सकती है।
गौरतलब है कि वर्ष 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार को विभिन्न जातियों के आरक्षण आंदोलन का सामना करना पड़ा है। गुजरात में पटेल बिरादरी ने सिरदर्दी बढ़ाई तो हरियाणा में जाट बिरादरी के आंदोलन से सरकार को परेशानी का सामना करना पड़ा। अब इसी कड़ी में महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन को खत्म करने का कोई रास्ता सरकार को नहीं सूझ रहा।
सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के मुताबिक सभी जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़ों को अलग से आरक्षण पर माथापच्ची बीते साल गुजरात में चरम पर पहुंचे पटेल आरक्षण आंदोलन केसमय से शुरू हुई थी। उसके बाद कई दौर की बातचीत होने के साथ कानूनी स्तर पर भी विमर्श हुआ है।
हालांकि अभी संकेत पूरी तरह से साफ नहीं हैं। मगर जिस प्रकार मराठा आरक्षण आंदोलन ने हिंसक रूप लिया है, उससे आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था कर ऐसी समस्या का स्थायी समाधान ढूंढे जाने पर नए सिरे से विमर्श शुरू हुआ है। इस क्रम में आयकर के दायरे से बाहर रहने वाले परिवारों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने पर भी बात हुई थी।
गडकरी ने भी दिए संकेत
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मराठा आरक्षण आंदोलन मामले में अपना पक्ष रखते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी इस आशय के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि एक ऐसी सोच है कि नीति निर्माता सभी समुदायों के गरीबों की सुध लें। गरीब तो गरीब ही होता है। हर जाति-पंथ और भाषा में गरीब तबके के लोग हैं। सभी समुदायों में ऐसे लोग हैं जिनके पहनने-ओढ़ने और भोजन की समस्या है।
अपनाना होगा संविधान संशोधन का रास्ता
सरकार वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में बिना किसी छेड़छाड़ के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था करना चाहती है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा को अधिकतम 50 फीसदी तक सीमित कर रखा है। ऐसे में आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए सरकार को संविधान संशोधन का रास्ता अपनाना होगा। मौजूदा समय में ओबीसी को 27 फीसदी, दलितों को 15 फीसदी और आदिवासियों केलिए 7.5 फीसदी आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था है।
उच्च सदन के इतर कहीं नहीं है मुश्किल
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संविधान संशोधन की राह में सरकार के सामने राज्यसभा के अलावा कोई और अड़चन नहीं है। लोकसभा में पर्याप्त संख्याबल और 21 राज्यों में खुद या सहयोगी की सरकार के कारण संविधान संशोधन को आधे राज्यों के विधानसभा से पारित कराना मुश्किल नहीं है। राज्यसभा में भी विपक्ष आर्थिक रूप से आरक्षण के विरोध में खड़ा होगा, इसकी संभावना बेहद कम है।