कोरोनावायरस महामारी दुनिया के कई शहरों में अभी भी कहर बरपा रही है। वैज्ञानिकों ने तो मान लिया है कि कोरोना महामारी कभी खत्म नहीं होने वाली है। जिसको देखते हुए वैज्ञानिक अगली पीढ़ी के टीकों पर काम कर रहे हैं। शीर्ष स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने कहा कि टीकों के विकास के लिए देश के भीतर बहुत सारे प्रयास चल रहे हैं।
कोविड-19 वर्किंग ग्रुप एनटीएजीआई के चेयरपर्सन डॉ एनके अरोड़ा के अनुसार अगली पीढ़ी के टीके की यह पूरी अवधारणा यह है कि हमें बार-बार खुराक नहीं देनी है। दूसरा यह है कि अगर हम वैक्सीन देते हैं तो यह कोरोना वायरस को भी कवर करता है और साथ ही भविष्य के वायरस से बचे रहेंगे और सुरक्षा लंबे समय तक बनी रहती है।
आगे उन्होंने कहा कि अगली पीढ़ी के टीकों में लोगों को भविष्य में वायरस से बचाने की क्षमता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हम स्ट्रेन-स्पेसिफिक वैक्सीन पर काम कर रहे हैं, कुछ बाइवैलेंट या दो तरह के वायरस को एक साथ मिलाने या चार तरह के वायरस को मिलाकर तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
डॉ अरोड़ा ने आगे कहा कि भारतीय कंपनियों और शिक्षाविदों ने इस चुनौती को स्वीकार किया है और अगले कुछ महीनों में इसके बारे में और जानकारी मिलेगी। देश के भीतर बहुत प्रयास चल रहा है। इसमें कुछ समय लग सकता है।
76.8 करोड़ वयस्कों में से 15.9 करोड़ लोगों को खुराक
सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 30 अगस्त तक 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल पांच ने कम से कम एक तिहाई वयस्क आबादी को बूस्टर खुराक दी थी। बूस्टर खुराक के लिए पात्र 76.8 करोड़ वयस्कों में से 15.9 करोड़ या पांच में से एक को बूस्टर खुराक मिली थी।
बड़े राज्यों में, आंध्र प्रदेश में 34.5 फीसदी पात्र लोगों को और छत्तीसगढ़ में 34.4 फीसदी लोगों को बूस्टर खुराक दी गई थी। दिल्ली की बूस्टर खुराक टीकाकरण दर 20.9 फीसदी और झारखंड की 8.7 फीसदी थी। चार राज्यों में 10 फीसदी से कम बूस्टर खुराक दी गई थी, साथ ही 18 राज्यों में टीका लगाने की दर 20.6 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से कम थी।