आशा सहायिका के रूप में काम करने वाली आशा देवी ने अपने समय में जो तकलीफें भोगी थीं, उसकी कसक ने उन्हें अपनी बेटियों को उस त्रासदी से मुक्त रखने की जिद और हिम्मत, दोनों ही दी। अपना बाल विवाह न रुकवा पाने और उसका खामियाजा भुगतने का दर्द रह रह कर उभर आता है उनके मन में।
लेकिन खुद झेली तकलीफों ने आशा देवी को इतना मजबूत जरूर कर दिया है कि उन्होंने अपनी दो बड़ी बेटियों का बाल विवाह नहीं होने दिया और छोटी दो के लिए भी उनका इरादा साफ है। पढ़ाई पूरी कर वे आत्मनिर्भर हो जाएं, तभी उनका विवाह करने का अपना इरादा वह दो-टूक लहजे में कहती हैं। बदलते ग्रामीण भारत की मिसाल सी है आशा देवी के संकल्प की यह छोटी सी कहानी।
श्रावस्ती के सिरसिया ब्लॉक के बिशुनापुर रामनगर गांव की आशा देवी इस बात को बखूबी जानती हैं कि कम पढ़ाई और 18 वर्ष से कम उम्र में लड़की की शादी कर देने से क्या क्या नुकसान बेटी को झेलने पड़ सकते हैं। इसलिए, बेटी भी आत्मनिर्भर हो, अपनी तरफ से इसकी कोशिश वे पूरी शिद्दत से कर रही हैं।
अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।