कालाधन के खिलाफ मोदी सरकार के पहले अभियान के रूप में बड़े नोटों को हटाने संबंधी कदम को आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ कालाधन खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम तो मानते हुए भी इसे नाकाफी बता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कालाधन को खत्म करने के लिए सरकार को चरणबद्घ तरीके से निरंतर कदम उठाना पड़ेगा। खासतौर से सरकार को सोना और अघोषित संपत्तियों के रूप में जमा कालाधन के खिलाफ तत्काल कदम उठाने होंगे। कई विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि सरकार को नोट बंदी के कालाधन के दूसरे बड़े स्रोतों पर धावा बोलना चाहिए था।
गौरतलब है कि नोट बंदी के फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुणे में 30 दिसंबर के बाद अघोषित संपत्ति मामले में कठोर कदम उठाने की घोषणा की है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन के मुताबिक नोट बंदी का फैसला कालाधन के प्रवाह को कम करने की दिशा में ठोस कदम साबित होगा। हालांकि इसका बेहतर निष्कर्ष तभी निकलेगा जब सरकार कालाधन के अन्य स्रोतों को बंद करने के लिए लगातार एक के बाद एक कदम उठाएगी।
भाजपा सांसद सुब्रमण्मय स्वामी का मानना है कि इससे कालाधन के प्रवाह में तो कोई खास कमी नहीं आएगी, मगर इस फैसले से हवाला रैकेट टूटा है और इसका सबसे अधिक असर आतंकवाद पर पड़ा है आर्थिक चिंतक गोविंदाचार्य सरकार के नोट बंदी के फैसले से सहमत नहीं हैं। वह कहते हैं खुद सरकार का मानना है कि करेंसी के रूप में देश में सबसे कम कालाधन है। कालाधन मुख्य रूप से सोना और अघोषित संपत्तियों के रूप में है। ऐसे में सरकार को इन स्रोतों के खिलाफ कदम उठाना चाहिए था। अगर ऐसा हुआ होता तो आम लोगों को इतनी अधिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।
हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ लॉर्ड मेघनाथ देसाई कहते हैं कि नोट बंदी का सबसे अधिक सकारात्मक असर भारतीय राजनीति पर पड़ेगा। बकौल देसाई करेंसी के रूप में मौजूद कालाधन ने भारतीय राजनीति को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। चुनाव लड़ना इतना महंगा हो गया है कि आम लोग राजनीति से ही दूर हो गए हैं। यह फैसला राजनीति को स्वच्छ बनाने की दिशा में कारगर कदम साबित होगा।