पश्चिम बंगाल में नाटकीय घटनाक्रम में मुख्य विपक्षी दल तूणमूल कांग्रेस का नियंत्रण ममता बनर्जी के हाथ से निकलकर अब बागी खेमे के पास चला गया है। राज्य विधानसभा की राजनीति इस समय सिर्फ बयानों या आरोपों में नहीं, बल्कि ठोस संख्या-बल के सुपर नंबर गेम में बदल चुकी है।
तृणमूल कांग्रेस के निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में 58 विधायकों का पत्र सामने आने के बाद जो तस्वीर उभरी है, उसने न सिर्फ विपक्ष के नेता पद का समीकरण बदल दिया है, बल्कि दलबदल कानून के खतरे को भी पार कर गई है। बागी खेमे की ओर से विधानसभा में जमा किए गए दस्तावेज के आधार पर यह स्पष्ट है कि अब लड़ाई बहुमत की नहीं, बल्कि वास्तविक परीक्षण के दौरान दावे कितने टिकाऊ साबित होते हैं। विधानसभा अध्यक्ष रथीन्द्र बोस ने फिलहाल पत्र तो स्वीकार कर लिया है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी। ऋतब्रत को नेता प्रतिपक्ष के समर्थन को लेकर विधायकों के हस्ताक्षर सत्यापन और विधायकों की स्वतंत्र सहमति की जांच होगी। अगर 60 विधायकों का दावा सत्यापित होता है, विपक्ष के नेता पद का विवाद समाप्त हो जाएगा, विस में शक्ति संतुलन के पुनर्लेखन की शुरुआत माना जाएगा।
30 सदस्य : विपक्ष के नेता के लिए न्यूनतम सीमा
294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में किसी भी दल को आधिकारिक विपक्षी दल का दर्जा पाने के लिए न्यूनतम 10 प्रतिशत समर्थन चाहिए। इसका अर्थ है कि विपक्षी दल का दर्जा प्राप्त करने के लिए 30 विधायकों की जरूरत है। इस स्तर पर ऋतब्रत खेमे को 60 विधायकों के हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र को डबल स्ट्रेंथ माना जा रहा है। 30 के मुकाबले 60 विधायकों का समर्थन यानी यह नियमों की न्यूनतम सीमा से काफी आगे निकल चुका है।
असली सांविधानिक दीवार: 54 का दलबदल गणित : तृणमूल कांग्रेस के वर्तमान प्रभावी विधायक = 79 (एक विधायक जेल में है) दो-तिहाई का गणित यानी 54 विधायक। यही वह सीमा है जिसके कारण दलबदल कानून लागू नहीं होगा।
विस में विपक्ष की भूमिका निभाने को तैयार : ऋतब्रत
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार को नाटकीय घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिल गई। इस फैसले के साथ ही विधानसभा के भीतर तृणमूल कांग्रेस के विधायक दल पर ममता बनर्जी खेमे की पकड़ ढीली हो गई है। ऋतब्रत ने बाद में पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि तृणमूल के टिकट पर निर्वाचित दो-तिहाई से अधिक विधायक उनके साथ हैं और वही अब वास्तविक विधायी दल का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऋतब्रत ने कहा कि फिलहाल 58 विधायक उनके साथ हैं और दो विधायकों का समर्थन है।
अब आगे क्या, दोनों गुटों के सामने कई विकल्प
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरे संकट ने राज्य की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। निष्कासित नेताओं और असंतुष्ट विधायकों की सक्रियता के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे क्या होगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में बागी गुट और ममता बनर्जी, दोनों के सामने कई महत्वपूर्ण विकल्प मौजूद हैं, जिनसे तृणमूल कांग्रेस का भविष्य तय हो सकता है। जिसमें बागी गुट अलग विधायक दल की मांग कर सकता है। यदि बागी विधायक पर्याप्त संख्या में अपने समर्थन का दावा साबित कर पाते हैं तो वे विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अलग विधायक दल के रूप में मान्यता की मांग कर सकते हैं। इससे विधानसभा के भीतर उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी। बागी गुट पार्टी के नाम और विरासत पर दावा ठोकते हुए खुद को असली तृणमूल बता सते हैं।
नई पार्टी बनाने का रास्ता भी खुला
यदि पार्टी के नाम और प्रतीक को लेकर विवाद बढ़ता है तो असंतुष्ट नेता नए नाम से अलग राजनीतिक दल का गठन कर सकते हैं। वहीं संकट से निपटने के लिए ममता बनर्जी संगठन में व्यापक बदलाव कर सकती हैं। पार्टी के विभिन्न स्तरों पर नए चेहरों को जिम्मेदारी देकर असंतोष कम करने की कोशिश की जा सकती है।