त्रिपुरा के शाही वंशज और टीआईपीआरए के अध्यक्ष प्रद्योत किशोर देबबर्मन ने शनिवार को बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय दल उनकी पार्टी की मूल मांग 'ग्रेटर टिपरालैंड' के लिए लिखित प्रतिबद्धता देने के लिए सहमत नहीं होते हैं तो उनकी पाार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में अकेले ही चुनाव लड़ेगी। इस दौरान उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी 60 में से 35 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ेगी। टीआईपीआरए त्रिपुरा की एकमात्र आदिवासी जिला परिषद की सत्तारूढ़ पार्टी है।
प्रद्योत किशोर देबबर्मन ने ये बातें शनिवार को अगरतला के स्वामी विवेकानंद स्टेडियम में समर्थकों की विशाल सभा को संबोधित करते हुए कहीं। भाजपा पर हमला करते हुए देबबर्मन ने कहा कि छह साल के लंबे समय के बाद, एक क्षेत्रीय पार्टी ने अगरतला में इस तरह की सभा का आयोजन किया है। हमारी आखिरी लड़ाई हमारे लोगों के लिए संवैधानिक समाधान की होगी। दिल्ली को हमारी बात सुननी चाहिए, यहां एकत्रित भीड़ का आकार सरकार को हमारी आवाज सुनने के लिए मजबूर करेगा। उन्होंने कहा कि ग्रेटर टिपरालैंड ही एकमात्र मांग है जिसके लिए हम लड़ रहे हैं।
इस दौरान उन्होंने कहा कि त्रिपुरा के स्वदेशी समुदायों के कुछ नेताओं को यह समझ में नहीं आता कि हमारे अधिकांश लोग क्या चाहते हैं। उन्होंने वहां मौजूद लोगों को चेताते हुए कहा कि हमारी एकता को तोड़ने के लिए आकर्षक प्रस्ताव दिए जाएंगे। वे(भाजपा) आपके द्वारा पद, शक्ति और पद की पेशकश के लिए आएंगे। लेकिन हमें नहीं टूटना होगा। उन्होंने कहा कि ग्रेटर टिपरालैंड की हमारी मांग संवैधानिक है। हम सिर्फ सत्ता और पद के लिए इसे नहीं भूल सकते। अगले 10-12 महीने बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमें सावधान रहना होगा और अपने रुख पर कायम रहना होगा।उन्होंने भारत सरकार से ग्रेटर टिपरालैंड के मुद्दे पर बातचीत की भी अपील की।
उन्होंने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि आज भारत सरकार ने हुर्रियत नेताओं के साथ बातचीत के दरवाजे खोल रखे हैं, जिन्हें भारतीय संविधान में कोई विश्वास नहीं है। एनएससीएन जो एक प्रतिबंधित संगठन है, उसे बातचीत के लिए निमंत्रण मिलता है। हम त्रिपुरा के तिप्रसा लोगों को जो लोकतांत्रिक रूप से चुने गए हैं, उन्हें बातचीत का मौका नहीं मिलता है। सरकार से बातचीत की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि हमें एक मौका दिया जाना चाहिए, हम आपको अपने लोगों की समस्याओं से अवगत कराएंगे। उन्होंने कहा कि पिछले 70 सालों से हमने अज्ञानता के अलावा कुछ भी नहीं देखा है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं थी। उनकी पार्टी के सत्ता में आने के बाद, एडीसी क्षेत्रों में रहने वाले एक भी गैर-आदिवासी समुदाय के व्यक्ति को उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा।
गौरतलब है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए इस रैली का महत्व है। त्रिपुरा में कुल मिलाकर 60 विधानसभा क्षेत्र हैं और उनमें से 20 अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा 15 सीटें ऐसी हैं जहां बड़ी संख्या में मतदाता आदिवासी समुदायों के हैं।
20 आरक्षित सीटों पर सत्तारूढ़ भाजपा के 11 स्वदेशी विधायक हैं जबकि उसकी सहयोगी पार्टी आईपीएफटी के आठ विधायक हैं। ऐसे में राज्य में टीआईपीआरए मोथा का उदय भाजपा के लिए गंभीर चुनावी झटका बन सकता है। बाकी 15 सीटों पर स्वदेशी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा की इस बार आगामी विधानसभा चुनावों में ऊंट किस करवट बैठता है।