लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत के बाद प्रतिष्ठित अमेरिकी मैगजीन ‘टाइम’ ने अपने सुर बदलते हुए बड़ा यू-टर्न लिया है। चुनाव परिणाम घोषित होने से पहले 10 मई के लेख में मोदी को ‘भारत का डिवाइडर इन चीफ’ यानी ‘प्रमुख विभाजनकारी’ बताने वाली इस अंतरराष्ट्रीय मैगजीन (पत्रिका) ने नतीजों के बाद मोदी पर एक और लेख छापा है।
ताजा लेख से पहले 10 मई को टाइम में छपे आतिश तासीर के लेख पर काफी विवाद हुआ था। चुनाव के दौरान प्रकाशित इस लेख का इस्तेमाल मोदी के विरोधियों ने प्रचार में खूब इस्तेमाल किया था, जिसकी मोदी समर्थकों ने आलोचना की थी। इस लेख में तासीर ने लिंचिंग के मामलों और यूपी में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने समेत कई बातों को लेकर मोदी सरकार की आलोचना की थी।
‘टाइम’ में छपे इस लेख में इंदिरा गांधी को 1971 में मिली जबरदस्त जीत का भी जिक्र किया गया। लेख में कहा गया है कि इंदिरा गांधी ने भले ही देश में भारी जीत दर्ज की थी लेकिन इसके बावजूद मोदी की जीत बहुत अधिक प्रभावशाली रही, क्योंकि मोदी को जिस तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है वैसा उस वक्त इंदिरा जी को नहीं करना पड़ा था।
वास्तविकता यह है कि ‘टाइम’ एक संकटग्रस्त अंतरराष्ट्रीय पत्रिका है, जिसका स्वामित्व एक ही साल के भीतर दो हाथों में जा चुका है। पिछले साल मार्च में इसे बेटर होम्स और गार्डन्स जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशक मेरेडिथ ने खरीदा था। उसके बाद सितंबर में यह दोबारा बिकी, जब इसे सेल्सफोर्स के संस्थापक और टेक उद्यमी मार्क बेनिऑफ तथा उनकी पत्नी ने खरीदा।
टाइम मैग्जीन ने 1947 के उस इतिहास का जिक्र भी किया, जब भारत को आजादी मिली थी और बताया कि किस तरह पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता को सरकार का मूल माना। लेकिन बदलते वक्त के साथ कांग्रेस का वंशवाद भारतीय राजनीतिक का एक प्रमुख चेहरा बन गया। कांग्रेस को कई दलों ने चुनौती पेश की, लेकिन 2014 का साल बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में भारत के राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर एक ऐसे शख्स (नरेंद्र मोदी) का अवतरण हुआ जो कांग्रेस की उन नीतियों और सिद्धांतों का विरोध कर रहा था जिसे कांग्रेस पार्टी अपनी कामयाबी के रूप में पेश करती थी। 2014 में जब नतीजे सामने आए तो कांग्रेस पूरी तरह सिकुड़ चुकी थी। एक ऐसी पार्टी जो भारत के सभी हिस्सों पर राज कर चुकी थी उसके लिए संसद में नेता विपक्ष के लिए आवश्यक आंकड़ों की कमी पड़ गई।
नरेंद्र मोदी देश के एक ऐसे तबके से आते हैं, जो बेहद गरीबी और अभावों में जीता है। उन्होंने जिस तरह से फर्श से अर्श तक का सफर पूरा किया है, उससे देश का गरीब और मध्य वर्ग उन्हें अपने बीच का मानता है और आदर्श के रूप में देखता है। जबकि 72 वर्षों तक देश की बागडोर संभालने वाला नेहरू-गांधी परिवार इस तरह के अनुभव से वंचित ही रहा है।
‘टाइम’ में प्रकाशित लेख के मुताबिक, नरेंद्र मोदी की दोबारा जीत इस बात का सबूत है कि भारतीय जनता ने काम के बदले जीत का तोहफा दिया है। इसका श्रेय उन नीतियों को जाता है, जिनका सीधा असर देश की गरीब जनता पर पड़ा और उन्होंने बदलाव को महसूस किया। मोदी सरकार की प्रगतिशील नीतियों का ही नतीजा रहा कि देश के हिंदू और अल्पसंख्यकों की गरीबी तेजी से घटी है। जबकि पूर्ववर्ती सरकारों में यह दर काफी धीमी थी।
मोर्गन स्टेनली ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था अस्थिर है और कभी भी ढह सकती है। इसका जिक्र करते हुए ‘टाइम’ ने लिखा है कि मोदी ने 2014 में कांग्रेस सरकार से विरासत में मिली अस्थिर अर्थव्यवस्था को स्थिर किया है। अब वही अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई और तेजी से बढ़ भी रही है।
मोदी द्वारा शुरू की गई योजनाओं ने उन्हें विश्व पटल पर चर्चा दिलाई। प्रधानमंत्री जनआरोग्य और प्रधानमंत्री आवास योजना ऐसे कार्यक्रम रहे, जिनका सीधा असर आम जनता पर पड़ा और लाभ भाजपा के खाते में आया। ये ऐसे फैसले थे, जो पूर्ववर्ती सरकारों ने कभी नहीं लिए थे।