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सौ साल में पहली बार बाघों की संख्या बढ़ी

Thu, 16 Jun 2016 05:04 PM IST
निकी रस्ट /बीबीसी
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lion - फोटो : BBC
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इस साल जंगलों से एक खुशखबरी आई है। पिछले 100 साल में पहली बार दुनिया भर में बाघों की तादाद में उछाल नजर आ रहा है। 2010 में दुनिया भर में 3200 बाघ थे। अप्रैल 2016 की गिनती में ये संख्या 3890 पाई गई। बाघों की आबादी बढ़ने की कई वजहें है। लेकिन जो सबसे बड़ी वजह है वो ये कि स्थानीय लोग अब इन जंगली, खतरनाक जानवरों के साथ रहने की आदत डाल रहे है। दुनिया में पाए जाने बाघों में से आधे भारत में रहते हैं।
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भारत के कई इलाकों में आदिवासी लोग जंगलों में बाघों की मौजूदगी के साथ ही रह रहे है। ये चौंकाने वाली बात है। क्योंकि बाघ कई बार इंसानों पर हमला बोलकर उन्हें मार डालते है। ऐसे में कौन खूनी पड़ोसी के साथ रहना चाहेगा? फिर भी, कई इलाकों में आदिवासी, बाघों के इलाके में रह रहे है। इस वजह से कई बार आदिवासी, बाघों की मदद भी कर रहे है। गैरसरकारी संस्था, 'सरवाइवल इंटरनेशनल' का कहना है कि आदिवासी लोग, क़ुदरत के सबसे अच्छे पहरेदार है। 

पश्चिमी घाटों में बाघ, जंगलों में सोलिगा नाम के आदिवासियों के साथ इलाका साझा करते है।

lion - फोटो : BBC
संस्था के पास इस दावे को सही ठहराने के लिए कई सबूत भी है। संस्था ने पिछले साल दिसंबर में पश्चिमी घाट में स्थित बीआरटी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के आंकड़े जारी किए थे, जहां 2010 से 2014 के बीच बाघों की आबादी दोगुनी हो गई। ये भारत में जनसंख्या बढ़ने की तेज रफ्तार से भी काफी बेहतर है। पश्चिमी घाटों में बाघ, जंगलों में सोलिगा नाम के आदिवासियों के साथ इलाका साझा करते है। सोलिगा आदिवासी, बाघ को देवता मानते है। वो उनकी पूजा करते हैं।

वो कभी भी बाघों से छेड़खानी नहीं करते, उनके साथ हिंसा तो दूर की बात है। आज बाघों और इंसानों के साथ रहने की और भी मिसालें देखने को मिलती है। अभी पिछले महीने ही महाराष्ट्र की बोर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के बारे में एक रिसर्च सामने आई। वहां रहने वाले लोग बाघों से बिल्कुल परेशान नहीं थे। शायद उन लोगों का खान-पान इसकी बड़ी वजह है। ज्यादातर स्थानीय लोग शाकाहारी है। तो वो खाने के लिए जानवरों का शिकार नहीं करते। इसलिए बाघों को अपने शिकार करने के लिए तमाम जानवर मिल जाते है।

बाघों के आस-पास होने की वजह से जानवरों से इनकी फसल की सुरक्षा की भी गारंटी मिलती है।

lion - फोटो : BBC
ये स्थानीय लोग खेती करते है। बाघों के आस-पास होने की वजह से जानवरों से इनकी फसल की सुरक्षा की भी गारंटी मिलती है। सोलिगा आदिवासियों के मुकाबले, बोर सैंक्चुअरी के पास रह रहे लोगों का बाघों से कई बार सामना हुआ। झगड़ा भी हुआ। कुछ जानवर और कुछ लोग मारे भी गए। फिर भी स्थानीय लोग, बाघों को खराब नहीं मानते। उनके साथ जिदगी बसर करने को तैयार है।

इसकी बड़ी वजह ये है कि सभी स्थानीय लोग हिंदू धर्म को मानने वाले है। जो ये समझते हैं कि बाघ, उनकी देवी दुर्गा का वाहन है। इसलिए भी वो बाघों को मारने से परहेज करते है। जंगली जानवरों को बचाने में अहम रोल के बावजूद भारत में कई जगहों से आदिवासियों को हटाया जा रहा है। बाघों के रहने वाले इलाकों में इंसानों को रहने दिया जाए या नहीं, ये सवाल काफी पुराना है।

इनमें से ज्यादातर को जंगल छोड़कर दूसरी जगह बसने पर कोई ऐतराज नहीं था।

lion - फोटो : getty images
1980 के दशक में बाघों की रिहाइश वाले इलाको में रहने वाले गुज्जर समुदाय के लोगों को हटाकर दूसरी जगह बसाया गया था। इनमें से ज्यादातर को जंगल छोड़कर दूसरी जगह बसने पर कोई ऐतराज नही था। जो लोग पहले जंगली इलाकों से बाहर जाकर बसे थे। उनकी जिन्दगियां बेहतर हुई थीं। उन्हें देखकर, जो बचे-खुचे लोग थे, वो भी जंगल छोड़कर जाने को राजी थे।

देश के दूसरे हिस्सों में ये फॉर्मूला कामयाब होगा या नहीं, कहना मुश्किल है। गुज्जरों को तो पता था कि उन्होंने क़ुदरती संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल कर लिया है। अब वहां से हटना ही बेहतर होगा। फिर जंगल से बाहर आने पर उन्हें पढ़ाई के और रोजगार के अच्छे साधन भी मिलेंगे। अगर वो जंगलों में रहने के लिए छोड़ दिए जाएंगे, तो, हो सकता है कि आगे चलकर वो जंगली जानवरों का शिकार करने लगें ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जब गुज्जरों ने भैंसे या दूसरे जानवरों की लाशों में जहर डाल दिया। जिससे जब बाघों ने उनका मांस खाया तो वो भी मारे गए।
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गुज्जर अक्सर अपने पालतू जानवरों को भी जहर खिलाकर मार डालते है।

lion - फोटो : getty images
इन बाघों की खाल और हड्डियों को अच्छी कीमत पर बेचने की खबरें भी आईं। गुज्जर अक्सर अपने पालतू जानवरों को भी जहर खिलाकर मार डालते है। ताकि बाघों का शिकार करने में वो जानवर काम आएं।
'सरवाइवल इंटरनेशनल' की सोफी ग्रिग कहती हैं कि ये सब बातें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाती है। उन्हें पता है कि आदिवासी, बहुत ज्यादा, जंगली जानवरों का शिकार नहीं करते।

हां, खाल और हड्डियां बेचने के लिए कई लोग बाघों को मार डालते है। लेकिन अक्सर ऐसा गुरबत की वजह से होता है। इंसानों पर हमला करने, उन्हें मारकर खाने वाले जीवों के बीच रहना बेहद मुश्किल काम है। लेकिन, अगर हम स्थानीय लोगों को, आदिवासियों को क़ुदरती संसाधानों के इस्तेमाल और रखरखाव की ज़िम्मेदारी दे दें, तो जंगली जानवरों की तादाद घटने से रोका जा सकता है।
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