भारत सरकार ने अपनी उदारता का परिचय देते हुए देश में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों को बेशक मतदान का अधिकार प्रदान कर दिया है, मगर यहां धर्मशाला में रह रहे तिब्बतियों के बीच भारतीय मतदाता बनने को लेकर द्वंद दिखाई पड़ रहा है। यही वजह है कि धर्मशाला में 18 वर्ष से ज्यादा उम्र के रह रहे 6596 तिब्बतियों में से महज 1000 के करीब तिब्बतियों ने ही भारत की नागरिकता स्वीकार कर मतदाता के रूप में अपना नाम दर्ज करवाया है।
दरअसल तिब्बतियों को लगता है कि यदि वे भारत की नागरिकता हासिल कर यहां के मतदाता बनते हैं तो उनके तिब्बत आंदोलन पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। यदि वे भारत के नागरिक बन गए तो तिब्बत जाने का उनका सपना अधूरा रह जाएगा, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि भारत की राजनीतिक धारा में जुड़ने से उनके आंदोलन को मजबूती मिलेगी।
सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले मैक्लोडगंज के तिब्बती नेता थीम्पा का मानना है कि भारतीय राजनीति के साथ जुड़ने से तिब्बत आंदोलन को ताकत मिलेगी, इसलिए वे भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने की वकालत करते हैं। थीम्पा के अनुसार अन्य तिब्बतियों को भी ऐसा ही करना चाहिए।
मैक्लोडगंज के सेंट्रल तिब्बतियन प्रशासन के इलेक्शन विभाग में सेक्शन ऑफिसर पद पर कार्य करने वाली फूरबू टोलमा की राय अलग है। टोलमा के अनुसार पूरे हिमाचल प्रदेश में रहने वाले 18 वर्ष से अधिक उम्र के तिब्बतियों की संख्या 9307 है।
टोलमा ने बताया कि भारत का मतदाता बनने को लेकर हमारा किसी भी तिब्बती पर दबाव नहीं हैं। वो अपनी मर्जी से भारत की नागरिकता ले सकते हैं या नहीं, लेकिन लोग यह मानते हैं कि यदि हम भारत की नागरिकता ले लेंगे तो तिब्बत वापस कैसे जाएंगे। टोलमा के अनुसार अकेले धर्मशाला में 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र के 6596 तिब्बती हैं।