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Kerala: पोंगाला पूजा में जुटी हजारों महिलाएं, अट्टुकल मंदिर में एक साथ धर्म और आस्था का अद्भुत मिलन

Thu, 13 Mar 2025 03:07 PM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, तिरुवनंतपुरम

सार

अट्टुकल भगवती मंदिर में पोंगाला उत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस उत्सव में पूरे राज्य और विदेशों से हजारों महिलाएं शामिल हुईं। महिलाएं चिलचिलाती धूप में छाते और सफेद शॉल ओढ़े, सिर पर टोपी लगाए, सड़क के किनारे ईंट के अस्थायी चूल्हे जलाकर पोंगाला अर्पित करने के लिए तैयार थीं।
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अट्टुकल में पोंगाला उत्सव - फोटो : PTI
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विस्तार
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केरला की राजधानी तिरुवनंतपुरम में गुरुवार को अट्टुकल भगवती मंदिर में पोंगाला उत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस उत्सव में पूरे राज्य और विदेशों से हजारों महिलाएं शामिल हुईं। महिलाएं चिलचिलाती धूप में छाते और सफेद शॉल ओढ़े, सिर पर टोपी लगाए, सड़क के किनारे ईंट के अस्थायी चूल्हे जलाकर पोंगाला अर्पित करने के लिए तैयार थीं। कुछ महिलाएं तो बुधवार रात से ही अपने चूल्हे के लिए अपने स्थानों पर इंतजार कर रही थीं। 
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उत्सव में दिखें मशहूर चेहरे
इस साल पोंगाला उत्सव में सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) ने भी हिस्सा लिया, जो पिछले एक महीने से सचिवालय के बाहर अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। इसके अलावा मशहूर हस्तियां जैसे अभिनेता जयराम की पत्नी पार्वती और उनकी बहू भी पवित्र अनुष्ठान के लिए मंदिर पहुंची। केंद्रीय राज्य मंत्री सुरेश गोपी और कई अन्य नेता भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

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10 बजकर 10 मिनट में शुरू हुआ अनुष्ठान
बता दें कि अनुष्ठान की शुरुआत सुबह 10:10 बजे हुई, जब मंदिर के मुख्य पुजारी ने मुख्य चूल्हा जलाया। इससे कार्यक्रम की शुरुआत का संकेत मिला। ढोल की थाप और संगीत के साथ महिलाएं पोंगाला बनाने में जुट गईं। पोंगाला में चावल, गुड़ और नारियल से बने पकवान को ताजे मिट्टी या धातु के बर्तनों में पकाया जाता है। 

पोंगाल उत्सव क्यों है खास एक नजर 
पोंगाला उत्सव की खासियत पर प्रकाश डालें तो, ये उत्सव अट्टुकल मंदिर के दस दिवसीय वार्षिक उत्सव का हिस्सा है। साथ ही इसे महिलाओं की सबरीमाला भी कहा जाता है। इस उत्सव का समापन पवित्र जल के छिड़काव के साथ हुआ। पुलिस और अग्निशमन विभाग ने सुरक्षा और व्यवस्था के लिए खास इंतजाम किए थे। 
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गौरतलब है कि यह उत्सव 2009 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हुआ था, क्योंकि इस दिन महिलाओं की सबसे बड़ी धार्मिक सभा का आयोजन हुआ था, जिसमें 2.5 मिलियन लोग शामिल हुए थे। इस अनुष्ठान की शुरुआत तमिल महाकाव्य 'सिलप्पाधिकारम' से जुड़ी स्थानीय किंवदंती से होती है।

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