पर्यावरण संरक्षण और बिजली सस्ती होने के चलते राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर ने इलेक्ट्रिक इंजनों में बदलाव करने शुरू कर दिए हैं। ऐसा एलएचबी कोच में ओवरहेड लाइनों के माध्यम से बिजली भेजने के लिए किया जा रहा है। इसे हेड ऑन जेनरेशन (एचओजी) के नाम से जाना जाता है।
भारतीय रेलवे की गणना के मुताबिक, पावर कार को नॉन एसी कोच के लिए हर घंटे 40 लीटर डीजल की आवश्यकता होती है वहीं एसी कोच में 65 से 70 लीटर डीजल खर्च होता है। एक लीटर डीजल लगभग तीन यूनिट बिजली उत्पन्न करता है, इस हिसाब से एक नॉन एसी कोच के लिए हर घंटे लगभग 120 यूनिट बिजली खर्च होती है। डीजल की 70 रुपये प्रति लीटर कीमत के हिसाब से एक नॉन एसी कोच में हर घंटे 2800 रुपये खर्च होते हैं।
दक्षिणी रेलवे जोन लगभग सात रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से तमिलनाडु जेनरेशन एंड डिस्ट्रिब्यूशन कॉर्पोरेशन (टैंजेनको) से बिजली खरीदती है। ऐसे में एन नॉन एसी कोच पर खर्च लगभग 840 रुपये प्रतिघंटा हो जाता है, जो कि पावर कार में डीजल के प्रयोग से काफी सस्ता है।
हालांकि एक अधिकारी के मुताबिक इसका नुकसान भी है। नुकसान यह है कि पावर कार को ट्रेन से हटाया नहीं जा सकता क्योंकि इससे ट्रेन के हर भाग को विद्युतीकृत नहीं किया जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर का लक्ष्य सौ प्रतिशत विद्युतीकरण करने का है और यदि हर इलेक्ट्रिक इंजन में एचओजी की व्यवस्था कर दी जाती है तो इससे होने वाली बचत काफी महत्वपूर्ण और आर्थिक रूप से बड़ी राहत देने वाली होगी।
अधिकारी के मुताबिक यह तकनीक भविष्य में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। डीजल आदि ईंधनों का जितना कम प्रयोग होगा पर्यावरण के लिए उतना ही बेहतर रहेगा साथ ही आर्थिक मजबूती भी आएगी। यहां कम होने वाले खर्च को यात्री सुविधाओं में खर्च कर रेलवे की व्यवस्थाओं को और बेहतर किया जा सकता है।