न्यायमूर्ति पटेल ने अपने फैसले में कहा था कि नए नियम सेंसरशिप की श्रेणी में आते हैं। जबकि, न्यायमूर्ति गोखल ने कहा था कि नियमों का अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। तब अदालत ने कहा था कि इस मुद्दे को तीसरे न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा और उनकी राय ली जाएगी। जिसके बाद ही फैसला सुनाया जाएगा। उस समय सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने कहा था कि सरकार नए नियमों के तहत फैक्ट चेकिंग इकाई का गठन तब तक नहीं करेगी, जब तक अदालत से अंतिम फैसला नहीं आ जाता। न्यायमूर्ति पटेल ने कहा था कि फैक्ट चेकिंग इकाई को दस दिनों के लिए आगे बढ़ाया जाए। इसे सॉलिसिटर जनरल ने मान लिया था।
याचिकाएं स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ट ऑफ इंडिया (ईजीआई) और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैग्जीन की ओर से दायर की गई हैं। न्यायमूर्ति पटेल और न्यायमूर्ति गोखले की पीठ ने गुरुवार को कहा कि नए नियमों की संवैधानिक वैधता के मुख्य मुद्दे पर और एफसीयू पर अंतरिम रोक जारी रखने की आवश्यकता है या नहीं, इस पर उनकी अलग-अलग राय है। इसलिए, एफसीयू के गठन पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिकाओं पर फैसला पारित करने से पहले इस मुद्दे को तीसरे न्यायाधीश के पास भेज दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नए संशोधित नियम मनमाने और असंवैधानिक हैं। न्यायमूर्ति पटेल ने नियमों को असंवैधानिक करार देते हुए इन्हें रद्द कर दिया। जबकि, न्यायमूर्ति गोखले ने इन्हें बरकरार रखा और याचिकाओं को खारिज किया। न्यायमूर्ति पटेल ने अपने 148 पन्नों के फैसले में संशोधित नियमों को किया। उन्होंने कहा कि नए नियम न केवल सेंशरशिप के बहुत करीब हैं, बल्कि उपयोगकर्ता (यूजर) की सामग्री को भी सेंसरशिप के दायरे में लाता है। वहीं, न्यायमूर्ति गोखले ने अपने 92 पन्नों के फैसले में कहा कि नियम उपयोगकर्ता के अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालते हैं।
केंद्र सरकार ने पिछले साल छह अप्रैल को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में कुछ संशोधन किए थे। जिसमें सरकार से जुड़ी फर्जी, झूठी या भ्रामक ऑनलाइन सामग्री के लिए फैक्ट चेकिंग इकाई के गठन का प्रावधान भी शामिल था।