प्रोफेसर डॉ. गिरिधर आर बाबू ने कहा, इस बारे में अभी और अध्ययन किए जाने की जरूरत है और यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या बूस्टर डोज कोरोना से लड़ने में ज्यादा कारगर साबित हो रही है।
कोरोना के टीके की तीसरे बूस्टर डोज देने की सिफारिश ज्यादातर अनुमान के आधार पर ही है। इसके लिए ज्यादा आंकड़ों की जरूरत है। यह कहना है विशेषज्ञों का।
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फाइजर और मॉडर्ना ने हाल ही में एलान किया था कि जिन लोगों ने उनके टीके लगवा दिए हैं, उन्हें संभव है कि इसी साल तीसरी खुराक भी लेनी पडे़ और बाद में यह साल दर साल लेनी पड़ सकती है।
आईसीएमआर नेशनल एड्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक समीरन पांडा ने कहा, जो कंपनियां तीसरी खुराक के बारे में सोच रही हैं, उन्हें पहले प्रतिरक्षा प्रणाली के बारे में ज्यादा से ज्यादा आंकडे़ जुटाने चाहिए। दो खुराक के बाद यह पता होना चाहिए कि शरीर में एंटीबॉडी की क्या स्थिति हैं और इसके स्तर में गिरावट कब आती है?
वहीं, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया में लाइफकोस एपीडिमियोलॉजी के प्रमुख और प्रोफेसर डॉ. गिरिधर आर बाबू ने कहा, इस बारे में अभी और अध्ययन किए जाने की जरूरत है और यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या बूस्टर डोज कोरोना से लड़ने में ज्यादा कारगर साबित हो रही है।