जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के समानांतर चल रही बैक चैनल बातचीत की कोशिशें काम नहीं आई। अलगाववादी हुर्रियत नेताओं ने प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत से इनकार कर राज्य और केंद्र सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
पिछले दो महीने में पीडीपी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के प्रतिबढ़ती नाराजगी के माहौल में केंद्र के सामने अलगाववादी नेता ही ऐसे विकल्प थे जो क्रुद्ध जनता के बीच जाकर उन्हें समझा सकते थे। पर्दे के पीछे काम कर रहे कश्मीर के रणनीतिकारों के मुताबिक घाटी में फिलहाल ऐसा कोई चेहरा नहीं रह गया है जो आम जनता के बीच जाकर बातचीत कर सके।
खुफिया विभाग के उच्चपदस्थ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि 1990 में भी ऐसे हालात पैदा हुए थे जब पूरा आंदोलन नेता रहित हो गया था। आज भी वही हालात बन गए हैं। सूत्रों ने मुताबिक राजनीतिक समाधान की बातचीत आवाम को विश्वास में लिए बिना नहीं हो सकता।