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उत्तर प्रदेश के उपचुनाव के नतीजों से तय होंगी ये बातें

Sun, 11 Mar 2018 04:00 PM IST
बीबीसी हिंदी
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EVM Shimla
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गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट पर रविवार को मतदान कराए जा रहे हैं। आमतौर पर बहुत कम उपचुनाव इतने ज्यादा दिलचस्पी भरे होते हैं।
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पिछले बुधवार को अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगने पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समर्थकों के सामने हवा में हाथ लहराते हुए कहा था, "इसे मामूली चुनाव मत समझो। बीजेपी यह चुनाव न होने देने के लिए हर तरह की टालमटोल कर रही थी। अब मौका मिला है तो इसे जीतने का काम करो।"

खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी लगातार अपनी सभाओं में तकरीबन यही बात कह रहे हैं और इसे अहम चुनाव बताते हुए समर्थकों और वोटरों को बड़ी संख्या में मतदान करने को कह रहे हैं।
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क्यों अहम हैं ये उपचुनाव?
आखिरकार यह उपचुनाव इतने अहम क्यों बन गए हैं और इसके नतीजे किन बातों पर अपना असर छोड़ेंगे, आइए इन 11 बातों से इसे समझने की कोशिश करते हैं।

1- हर चुनाव की तरह यह चुनाव भी किसी की हार और किसी की जीत तय करेंगे। दोनों ही सीटों पर मुख्य मुकाबले में वही दल है जिन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में पंजे भिड़ाए थे। इन सीटों पर जीत दोनों के लिए बहुत मायने रखती है।

2- इस चुनाव के नतीजे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए शायद सबसे ज्यादा अहम हैं। यदि अपनी अगुवाई में वे जीत दिलाते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति में उनके कद में जबरदस्त इजाफा होगा। देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री बनने के बाद वैसे भी पार्टी ने उन्हें गुजरात, त्रिपुरा और कर्नाटक जैसे दूरवर्ती क्षेत्रों में भी स्टार प्रचारक के बतौर भेजा है। उपचुनाव की जीत उन्हें और ताकतवर नेता का दर्जा देगी और राष्ट्रीय स्तर पर खासतौर पर 2019 की चुनावी रणनीति में मोदी और शाह के बाद शायद पार्टी के वे सबसे चमकीले चेहरे के तौर पर पहचाने जाएंगे।

3- प्रदेश भाजपा की राजनीति में भी इन चुनाव के नतीजे एक महत्वपूर्ण असर डालेंगे। पिछले कुछ समय से रह रह कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच तनातनी की खबरें आती रही है। संयोग से यह दोनों उपचुनाव इन्हीं दोनों व्यक्तियों द्वारा खाली की गई सीटों पर हो रहे हैं। दोनों पर अपनी अपनी सीटों को जिताने का जिम्मा और दबाव है। जाहिर है कि किसी एक सीट पर आया खराब परिणाम उस व्यक्ति की आकांक्षाओं और प्रगति के आगे एक लक्ष्मण रेखा खींच देगा।

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
4- क्षेत्रीय या इलाकाई राजनीति में भी योगी के लिए गोरखपुर संसदीय सीट का उपचुनाव बहुत मायने रखता है। लगभग दो दशक से अपने मेहनत और राजनीतिक चातुर्य के चलते वो पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे कद्दावर राजनेता के तौर पर उभरे हैं और सूबे की सबसे बड़ी कुर्सी पर उनका दावा इसी के चलते सबसे ताकतवर साबित भी हुआ था। खुद प्रत्याशी ना रहते हुए भी यदि वह इन चुनाव में जीत दिला देते हैं तो क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में उनके हैसियत न सिर्फ बरकरार रहेगी बल्कि और चमकदार भी होगी।

5- इन चुनाव के नतीजे यह भी तय करेंगे की 2014 और फिर 2017 में मोदी और शाह की कामयाबी से जातीय समीकरण तोड़ने की रणनीति आगे भी बरकरार रहेगी या सपा बसपा गठबंधन के रूप में उभरे और एक बार पहले भी आजमाए जा चुके अचूक और मारक जातीय समीकरण का असर उसे ध्वस्त कर देगा। यदि उपचुनाव में गठबंधन जीत जाता है या जीत के अंतर को मामूली बना देता है तो यह भारतीय राजनीति में एक बार फिर से जातीय गठबंधनों के फैशन की वापसी करा देगा।

6- उपचुनाव के नतीजे बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए कम अहम नहीं। वो और उनकी पार्टी भले ही मैदान में न हों लेकिन गठबंधन की कामयाबी सबसे ज्यादा इसी बात से तय होगी कि उनका वोटर उनके निर्देश पर सपा को उसी तरह एकमुश्त वोट ट्रांसफर करता है या नहीं जैसा वह बसपा के लिए करता रहा है। नतीजे इस बात की भी चुगली करेंगे कि अपने वोट बैंक पर बहन जी का असर बरकरार है या भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसमें दरार डालने में कामयाब हो चुके हैं।

7- एक जमाने में उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण राजनीति का वर्चस्व हुआ करता था। सपा और बसपा के शासनकाल में भी यह किसी न किसी रूप में अपना असर बरकरार रखे हुए था लेकिन खुद भाजपा ने भी यह महसूस किया था कि प्रदेश में नई सरकार के बाद ब्राह्मण पार्टी से उदासीन या दुखी हो गए हैं। शिव प्रताप शुक्ला को पहले राज्यसभा का टिकट देने, उन्हें केंद्र में मंत्री पद देने या महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपने को भी डैमेज कंट्रोल की कवायद के रूप में ही देखा गया था। इस बात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है गोरखपुर संसदीय सीट पर चुनाव घोषित होते ही ब्राह्मण प्रत्याशी लाए जाने की चर्चा शुरू हो गई थी जिसकी तस्दीक उपेंद्र दत्त शुक्ल को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद हो भी गई थी। इस इलाके में कभी ब्राह्मण राजनीति की दूर रहे पंडित हरिशंकर तिवारी के राजनीतिक प्रभाव के बाद यहां ब्राह्मण राजनीति की मजबूती के समर्थक भी इस चुनाव को लेकर खासे सक्रिय दिखाई देते हैं।

 
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : अमर उजाला
8- लेकिन इन उपचुनावों के नतीजे अगर किसी राजनीतिक दल पर सबसे ज्यादा असर डालेंगे तो वह कांग्रेस है। राष्ट्रीय स्तर पर खुद को भाजपा का स्वाभाविक और एक मात्र विकल्प मानने वाली कांग्रेस इन चुनावों में अजीब-सी स्थिति में फंस गई है। विधानसभा चुनाव में सपा ने उसके साथ गलबहियां की थी मगर इस बार वह बसपा के साथ जा खड़ी हुई है। गोरखपुर में कांग्रेस के नेता आरपीएन सिंह ने एक पत्रकारवार्ता में इस बात का खुलासा किया था कि कांग्रेस ने सपा को दोनों जगहों में से एक-एक सीट बाँटकर एकजुटता के साथ चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था लेकिन सपा ने उसकी बजाय बसपा से हाथ मिला लिया। नतीजे आने के बाद हर कोई कांग्रेस उनको मिले वोटों और मत प्रतिशत का विश्लेषण करता नजर आएगा और पहले से ही मुश्किलों में जूझ रही पार्टी के लिए यह और असहज स्थिति हो सकती है। गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट पर रविवार को मतदान कराए जा रहे हैं। आमतौर पर बहुत कम उपचुनाव इतने ज्यादा दिलचस्पी भरे होते हैं। पिछले बुधवार को अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगने पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समर्थकों के सामने हवा में हाथ लहराते हुए कहा था, "इसे मामूली चुनाव मत समझो। बीजेपी यह चुनाव न होने देने के लिए हर तरह की टालमटोल कर रही थी। अब मौका मिला है तो इसे जीतने का काम करो।" खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी लगातार अपनी सभाओं में तकरीबन यही बात कह रहे हैं और इसे अहम चुनाव बताते हुए समर्थकों और वोटरों को बड़ी संख्या में मतदान करने को कह रहे हैं।

9- उपचुनाव के नतीजों से यह भी पता चलेगा कि क्या मुस्लिम समुदाय ने सचमुच वह 'साइलेंट टैक्टिकल वोटिंग' सीख ली है जिसकी जरूरत उसके नेता अक्सर बताया करते थे। बीते तमाम चुनावों में मुस्लिम मतों का बिखराव होता रहा है। इस बार माना जा रहा है कि ऐसा नहीं होगा। यदि सचमुच ऐसा हुआ तो यह नतीजों पर असर डालने वाली सबसे बड़ी चीज होगी।

10- उपचुनाव के नतीजे यह भी बताएंगे कि गोरखपुर में पिछले 16 सालों में योगी की राजनीति और उनकी सड़कों पर दिखाई देने वाली ताकत के पीछे अहम भूमिका निभाने वाली हिंदू युवा वाहिनी के अदृश्य होने का क्या असर पड़ा है? आपको याद होगा कि 1999 के चुनाव में बेहद नजदीकी मुकाबले में जीत दर्ज करने के बाद योगी आदित्यनाथ ने यह समझ लिया था कि इस इलाके में राजनीति करने के लिए उन्हें पार्टी के सांगठनिक ढांचे के साथ-साथ एक ऐसी फौज की जरूरत भी है जो समर्पित भाव से उन्हीं के लिए काम करें। इन्हीं परिस्थितियों में हिंदू युवा वाहिनी का गठन हुआ था और बहुत कम समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश के तकरीबन हर हिस्से में वाहिनी ने अपना सांगठनिक ढांचा वजूद में ला दिया था जिसका लाभ योगी को अपने हर चुनाव में, अभियान में ठीक से मिलता रहा है। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने हिंदू युवा वाहिनी को एक नियंत्रित स्वरूप देते हुए अब उसे एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन की लक्ष्मण रेखा के भीतर ही रखा है। पिछले 10 महीनों में वाहिनी की सार्वजनिक या राजनीतिक अभिव्यक्तियां न के बराबर हैं और चुनाव में भी वह कहीं नहीं दिखाई दे रही। इस चुनाव में जीत के अंतर का जब भी कभी विश्लेषण होगा तो उसमें हिंदू युवा वाहिनी के होने या ना होने का सर्वे भी पढ़ा जाएगा।

11-इन उपचुनावों में पहले की तरह का हो-हल्ला गायब है। सड़कों पर दौड़ती प्रचार गाड़ियां भी नहीं दिख रहीं। बड़े होर्डिंग और अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन में भी बेहद कमी आई है। नए प्रकार के प्रचार अभियानों में अपनी-अपनी जातियों के बहुमत वाले इलाकों में जा रहे नेता दिखते हैं और फेसबुक की मदद से खास तौर पर चिन्हित किए गए इलाकों और वोटरों तक डिजिटल संपर्क स्थापित किया जा रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश को पारंपरिक राजनीति का गढ़ माना जाता रहा है। नतीजे बताएंगे कि इन परंपराओं पर नए प्रयोग भारी पड़े हैं या नहीं।
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