संसद के उच्च सदन में बहुमत से लंबीचौड़ी दूरी के बावजूद मोदी सरकार को मिल रही सफलता किसी भी हैरान कर सकती है। खासतौर पर कांग्रेस के नेतृत्व में हर बार अहम मौके पर सरकार को घेरने की कोशिश विफल ही रही है। दरअसल, राज्य सभा में मोदी सरकार की राह लगातार एक तिकड़ी आसान कर रही है। तीन दलों की यह तिकड़ी न केवल सरकार को कठिन परिस्थितियों में संबल दे रही है, बल्कि कांग्रेस की विपक्षी एकता की कोशिशों को भी पलीता लगा रही है। बीते लोकसभा चुनाव के बाद सियासी दलों की इस तिकड़ी की बदौलत मोदी सरकार अपने कई अहम फैसलों को सफल बना चुकी है।
फिलहाल मामला कृषि क्षेत्र से जुड़े तीन अहम बिलों का है। सोमवार को इनमें से दो बिलों को पारित कराने के तरीके पर मचे विवाद के बाद से कांग्रेस विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशों में जुटी है। एनसीपी, आप, वाम दल, टीएमसी, एसपी, बीएसपी, टीआरएस जैसे कई दल एक मंच पर आ भी गए हैं। इन दलों का आरोप है कि सरकार ने पर्याप्त संख्या बल न होने के बावजूद जबरदस्ती इन बिलों को पारित करा लिया। हालांकि इसी उच्च सदन में अन्नाद्रमुक, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस जैसे दल हैं, जो कांग्रेस की इस मुहिम से दूर हैं। जाहिर तौर पर इससे यह सियासी संदेश गया है कि इन बिलों को पारित कराने के लिए सरकार के पास इन तीन दलों का समर्थन था। इस हिसाब से सरकार के पास 243 सदस्यों वाली राज्यसभा में 125 सदस्यों का पर्याप्त समर्थन मौजूद था।
भाजपा के मूल एजेंडे को जमीन पर उतारने में सहयोग
दरअसल, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने के बावजूद मोदी सरकार अपने अहम एजेंडे से जुड़ा कोई भी कदम महज इसलिए नहीं उठा सकी थी कि उसके पास राज्य सभा में अपने फैसलों को अमलीजामा पहुंचाने का पर्याप्त समर्थन नहीं था। लेकिन लोकसभा चुनाव-2019 के महज कुछ महीने बाद ही मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 निरस्त करने, नागरिकता संशोधन कानून बनाने, तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाने जैसे अपने अहम एजेंडे को जमीन पर उतारने की ताबड़तोड़ मुहिम चलाई है। लेकिन ऐसा इन तीन दलों के समर्थन से ही संभव हो पाया, जो सरकार के हर फैसले के लिए उच्च सदन में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समर्थन की ढाल लेकर खड़े दिखाई दिए।
इस बार टीआरएस ने किया किनारा
हालांकि सरकार के अहम एजेंडे को जमीन पर उतारने में भाजपा को तेलंगाना की टीआरएस का भी परोक्ष और प्रत्यक्ष साथ मिलता रहा है। लेकिन कृषि क्षेत्र से जुड़े बिलों के मुद्दे पर इस बार टीआरएस भी विपक्ष के खेमे में पहुंच गया है।
समर्थन देना है तिकड़ी की सियासी मजबूरी
दरअसल इन दलों की सियासी मजबूरी है कि वह कांग्रेस के साथ भी एक मंच पर नहीं दिख सके। इन दलों का अपने-अपने प्रभाव वाले राज्य में कांग्रेस के साथ ही सियासी मुकाबला है। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु में कांग्रेस इन दलों की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है। ओडिशा में भी बीजेडी का गठन कांग्रेस के ही विरोध में हुआ। यही कारण है कि राज्य की सियासत के मद्देनजर ये दल केंद्र की राजनीति में भी कांग्रेस से दूरी बनाते आए हैं। उच्च सदन में इसका लाभ भाजपा को मिल रहा है।