राफेल सौदे की सुनवाई में नए दस्तावेजों पर विचार करने का निर्णय लेने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता की हिमायत की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि देश के लोकतंत्र की मजबूती केलिए प्रेस की स्वतंत्रता जरूरी है। हालांकि शीर्ष अदालत ने मीडिया में पक्षपात केगलत चलन को लेकर आगाह भी किया है।
चीफ जस्टिस रंजन गोगई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएस जोसफ की पीठ ने यह बात केंद्र सरकार की उस आपत्ति पर कही है जिसमें कहा गया था कि एक अखबार ने गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित किया है। जहां सरकार का कहना था कि गैरकानूनी तरीके से दस्तावेज हासिल कर इसे प्रकाशित किया गया है, लिहाजा इन्हें पुनर्विचार याचिकाओं के जरिए रिकार्ड पर नहीं लिया जाना चाहिए। वहीं शीर्ष अदालत ने कहा है कि इस तरह के दस्तावेजों का प्रकाशन संविधान केतहत मिले बोलने व अभिव्यक्ति केअधिकार के अनुरूप है।
चीफ जस्टिस रंजन गोगई और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अपने इस फैसले में कहा कि वर्ष 1950 से सुप्रीम कोर्ट लगातार प्रेस की आजादी की बात करता रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने पर रोक लगाता हो। साथ ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो ऐसे दस्तावेजों को अदालत में पेश करने पर रोक लगाता हो। उन्होंने कहा है, हमारी जानकारी में आपराधिक गोपनीय कानून या किसी अन्य कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें संसद द्वारा कार्यकारी अधिकार के तहत गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने पर रोक लगाया गया हो।’
वहीं न्यायमूर्ति के एम जोसफ ने भी अपने फैसले में प्रेस की स्वतंत्रता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि भारतीय प्रेस का देश में लोकतंत्र को मजबूत करने में भारी योगदान है। न्यायमूर्ति जोसफ ने कहा है, देश के जीवंत लोकतंत्र बरकरार रखने में प्रेस की भूमिका निर्णायक रही है।’ हालांकि उन्होंने कहा कि खबरें सही होनी चाहिए और प्रदूषित नहीं होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति जोसफ ने कहा है कि प्रेस को भयमुक्त रहना चाहिए और निष्पक्ष होना चाहिए। व्यक्तिगत, राजनीतिक या आर्थिक स्वार्थ के लिए पक्षपातपूर्ण खबरे नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर जिम्मेदारी के साथ प्रेस अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं करेगा तो इससे लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा।
न्यायमूर्ति जोसफ ने अपने फैसले में यह भी कहा है, प्रेस में कुछ ऐसा भी समूह है जहां पक्षपात दिखता है। यह गलत चलन है। व्यावसायिक हित और राजनीतिक वफादारी दिखाने के चक्कर में निष्पक्ष जानकारी देने के दायित्व का क्षरण होता है।