21 साल पुराने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी पढ़ाई की बजाय राजनीतिक अखाड़ा बना हुआ है। इसके कैंपस में कई कोर्स बिना विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की मंजूरी के चल रहे हैं। इसका खुलासा यूजीसी की ओर से यूनिवर्सिटी की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। साथ ही रिपोर्ट में जातिवाद और राजनीतिक दलों के चलते इस संस्थान के कबाड़ा होने का दर्द भी बयां किया गया है।
यूजीसी की ओर से विश्वविद्यालयों की जांच के लिए गठित कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इसके अनुसार, यूनिवर्सिटी के कैंपस में इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (यूआईईटी) में बीटेक में सौ और एमटेक में तीन छात्र पढ़ते हैं।
पढ़ें- अंबेडकर यूनिवर्सिटी के वीसी का फरमान, शाम 6 बजे के बाद विवि में न रुकें महिला कर्मचारी-लड़कियां
हालांकि यूआईईटी में एक भी नियमित शिक्षक नहीं है, सिर्फ अस्थायी शिक्षकों से काम चल रहा है। साथ ही यहां सेल्फ फाइनेंस मोड से कोर्स चल रहे हैं। इसकी यूजीसी और एआईसीटीई से मंजूरी भी नहीं ली गई है। यूनविर्सिटी में 78 कोर्स चलते हैं, जिसमें से महज 27 को ही नियमित कोर्स की मंजूरी यूजीसी से मिली है। वहीं, 37 कोर्स सेल्फ फाइनेंस मोड से चल रहे हैं, जिसमें से 25 से अधिक की यूजीसी से मंजूरी ही नहीं ली गई।
आपसी तालमेल तक नहीं
ऑडिट रिपोर्ट में कमेटी ने लिखा है कि 21 साल में यूनिवर्सिटी ने 20 फीसदी अकेडमिक गोल तक पूरा नहीं किया है। किसी भी यूनिवर्सिटी को आगे बढ़ाने में प्रिंसिपल एडमिनिस्ट्रेटिव (कुलपति, रजिस्ट्रार व वित्त अधिकारी) के बीच वर्किंग संबंध तो छोड़िए सिविल संबंध जैसा भी कुछ नहीं है, जोकि हैरान करने वाला है।
उक्त तीनों एक कमरे में बैठकर किसी योजना पर बात तक नहीं करते हैं। वे आपस में बात तक नहीं करते हैं। कुलपति का कार्यकाल जनवरी 2018 में पूरा हो रहा है। यूनिवर्सिटी में जैसे काम हो रहा है, उससे इसका कोई भविष्य नहीं है। इसलिए उक्त अधिकारियों को पद से हटा दिया जाना चाहिए।
हिंदी विभाग में एक भी स्थायी फैकल्टी नहीं
रिपोर्ट में लिखा है कि हिंदी विभाग में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है। यूनिवर्सिटी में 52 छात्रों पर एक शिक्षक उपलब्ध है। स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में महज पांच फैकल्टी है। जबकि चार वर्षीय एमबीए प्रोग्राम में सौ छात्र पढ़ते हैं।
जातिवाद और राजनीति का बोलबाला
कैंपस में पचास फीसदी सीटें एससी व एसटी की हैं। यहां जाति का बोलबाला है और उसी के आधार पर भेदभाव भी होता है। यहां जातिवाद और राजनीतिक पार्टियां हावी है, जिसके चलते इसका कबाड़ा हो रहा है।