नौकरी की खातिर उत्तराखंड की युवा आबादी अपनी जन्मभूमि से दूर हो रही है। आए दिन यहां के खाली होते गांवों की खबरें चर्चा में रहती हैं। लेकिन मैंने दिल्ली, गुरुग्राम जैसे महानगर की सुख-सुविधाएं सिर्फ इसलिए छोड़ दी ताकि खुद को सुकून देने के साथ गांव के किसानों के लिए कुछ कर सकूं। मैं उत्तराखंड के मुक्तेश्वर की रहने वाली हूं।
मैंने अपनी स्कूली शिक्षा उत्तराखंड के नैनीताल और रानीखेत से पूरी की। इसके बाद एमबीए किया और करीब चार साल तक गुरुग्राम में एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम किया। वहीं मेरी उच्च शिक्षित बहन भी एक मल्टीनेशनल कंपनी के साथ काम कर रही थी। नौकरी के दौरान मौका मिलते ही मैं अपने माता-पिता से मिलने नैनीताल पहुंच जाती थी।
इस दौरान मैंने अनुभव किया कि मेरी जिंदगी तो बड़े आराम से गुजार रही है, लेकिन रोज की भागदौड़ में वह सुकून नहीं मिल पाता जो पहाड़ की वादियों में था। कुछ महीनों की कशमकश के बाद मैंने घर लौटने व जैविक खेती के साथ किसानों को जागरूक करने का फैसला किया। नैनीताल वापस आने के बाद मैं और मेरी बहन अपने पिता के साथ मुक्तेश्वर आई। यहां कुछ दिन बिताए और यहां के हालात, खेती और किसानों की स्थिति का जायजा लिया।
इस दौरान मैंने देखा कि यहां की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित हैं, लेकिन स्थानीय लोग कृषि उत्पादन बढ़ाने को लेकर जागरूक नहीं हैं और न ही वह जैविक खेती के बारे में कुछ जानते हैं। जबकि दूसरी ओर शहरों में जैविक उत्पादों की काफी मांग है। इसी विचार के साथ जीरो बजट खेती करने का प्रशिक्षण लेने मैं देश के कई राज्यों में गई, विशेषज्ञों से बातचीत की। इस काम में परिवार का समर्थन मिला, तो वर्ष 2014 में हमने मुक्तेश्वर में 25 एकड़ जमीन पर खेती शुरू कर दी।
शुरुआत में मुझे कई तरह की परेशानियों से जूझना पड़ा, क्योंकि यहां के स्थानीय लोगों के लिए हमारा विचार बिलकुल नया था, जिस पर उन्हें विश्वास करने में कुछ समय लगना स्वभाविक था। मैंने किसानों को जैविक खेती के तरीके बताए और उन्होंने थोड़े समय बाद इसे अपनाया। हलांकि लाभ मिलने के बाद अन्य किसान भी इस तरफ आकर्षित हुए। मैंने इन किसानों के साथ अपनी उपज को देश के महानगरों में उपलब्ध कराया, जिससे हमें स्थानीय मंडियों की अपेक्षा ज्यादा फायदा हुआ। अब यहां के दर्जनों किसान जैविक खेती कर रहे हैं।
शहरों में रहने के दौरान मैंने महसूस किया कि वहां रहने वाले लोग कुछ समय प्रकृति के करीब भी रहना चाहते हैं। तब मैंने सोचा कि गांव में आकर खेती करने के लिए शायद ही कोई तैयार होगा, लेकिन जब हम उनसे यह कहेंगे कि आप गांव में आकर कुछ दिन छुट्टियां मनाइए, तो हर कोई तैयार हो जाएगा। इस उद्देश्य से हमने ‘दयो – द् ऑर्गेनिक विलेज रिसोर्ट’ की स्थापना की। यहां आने वाले पर्यटक फॉर्म में जाकर अपनी पसंद की सब्जियों को तोड़ सकते हैं और रिसॉर्ट के शेफ को देकर मनपसंद खाना बनवा सकते हैं। मेरी कोशिश है कि उत्तराखंड के अन्य गांवों में भी किसानों को जागरूक किया जाए। साथ ही अब कृषि उत्पादों को बेचने के लिए मैं सप्लाई चेन बनाने की योजना पर कार्य कर रही हूं।
मुझे लगता है कि, यदि उत्तराखंड से पलायन पर रोक लगाना है, तो नई तकनीकों और विचारों के साथ फिर से अपने गांवों की ओर लौटना होगा। आज समय आ गया है कि युवाओं को शहरों की भीड़ से निकलकर अपने गांव को संभालना होगा, क्योंकि कुछ अलग करना है, तो भीड़ से हटकर चलने की आवश्यकता है।