संसद में लंबे समय से अटके जीएसटी विधेयक की राह मानसून सत्र में भी आसान नहीं लग रही है। सरकार को अब नए सिरे से कांग्रेस पार्टी के नेताओं को साधाना पड़ेगा। बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने जीएसटी के मोर्चे पर मैदान में अपने नए खिलाड़ी उतार दिए हैं।
अब तक इस मामले में सरकार से बातचीत का जिम्मा संभाल रहे गुलाम नबी आजाद और आनंद शार्मा के बजाय कांग्रेस ने पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल को मैदान में उतार दिया है। अब सरकार के रणनीतिकारों ने चिदंबरम और सिब्बल को साधना पड़ेगा, जोकि बेहद मुश्किल काम माना जा रहा है।
सरकार के रणनीतिकारों की मानें तो आजाद और आनंद शर्मा कांग्रेस पार्टी में जीएसटी के पैरोकार नेताओं में गिने जाते हैं, जबकि चिदंबरम और सिब्बल शुरू से ही जीएसटी पर सरकार को सहयोग के पक्ष में नहीं रहे। लेकिन सरकार ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार का कहना है कि जीएसटी पर कांग्रेस पार्टी भी कदम आगे बढ़ाने के मूड में है।
हर कोई चाहता है कि मानसून सत्र में हम जीएसटी पर सार्थक निर्णय तक जाएं। सरकार की ओर से नरमी के संकेत देते हुए उन्होंने कहा कि हम मन बड़ा करके चल रहे हैं। कांग्रेस के अलावा वे सभी दलों से व्यक्तिगत बातचीत करके सर्वसम्मति बनाएंगे। अनंत कुमार ने कहा कि कांग्रेस नेता एक बार अपने नेतृत्व से बात करेंगे। उसके बाद चर्चा होगी। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट कर चुके हैं कि ये राजनीतिक बढ़त लेने का मामला नहीं है बल्कि देश के विकास का मामला है।
जीएसटी पर कांग्रेस से पार पाना सरकार के लिए अब भी आसान नहीं है। चिदंबरम ने अनौपचारिक तौर पर सरकार से जीएसटी पर होने वाले बदलाव का लिखित नोट मांगा है। कांग्रेस पार्टी अपनी मांगों को संशोधन में शामिल किए बिना आगे नहीं बढेगी।
चिदंबरम ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी जीएसटी के विरूद्ध नहीं है। वह बिल के कुछ प्रावधानों के विरूद्ध है। उधर सरकार ने बेशक नरमी के संकेत दिए हैं। मगर कांग्रेस के लिखित नोट के मामले पर सरकार अभी झूकने के मूड में नहीं है। जीएसटी मामले को डील कर रहे सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के अनुसार कांग्रेस पार्टी में बिल को लेकर अभी एकराय नहीं है। वहां बिल के पक्ष और विपक्ष के रूप में दो धड़े हैं।
चिंदबरम ने संकेत दे दिए हैं कि बिल में संशोधन की उनकी मांगों पर अमल का पुख्ता आश्वासन सरकार की ओर से नहीं मिलेगा। तब तक बात आगे नहीं बढ़ेगी। बिल पर सर्वसम्मति बनाकर आगे बढने की सरकार की सोच और विपक्ष के नए हठ को देखकर मानसून सत्र में भी जीएसटी की राह आसान नहीं दिख रही है, तो वाम दल पहले से ही बिल के विरोध का अपना रुख जता चुके हैं।