सीआरपीएफ के मौजूदा आईजी जो कि कॉडर अधिकारी हैं, का बड़े साफ तौर पर कहना है कि 'कॉल इंटरसेप्ट' करने का अधिकार मांगने के लिए सीआरपीएफ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को दर्जनों पत्र लिखे हैं। एक-दो साल से नहीं, बल्कि सात-आठ साल पहले से यह पत्राचार चल रहा है। मंत्रालय द्वारा हमेशा एक ही जवाब दिया जाता है, कॉल इंटरसेप्ट की पावर नहीं मिलेगी। सीआरपीएफ के अलावा बीएसएफ ने भी केवल हाई अलर्ट बॉर्डर के लिए यह अधिकार मांगा था, लेकिन उन्हें भी जवाब 'ना' मिला।
अधिकारी बताते हैं कि हमने गृह मंत्रालय को आश्वस्त किया गया था कि यह पावर केवल जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़ या दूसरे वे राज्य, जहां आतंकी और नक्सली बड़े हमलों को अंजाम देते हैं, वहीं के लिए दे दी जाए।अगर यह पावर मिल जाती तो हमें रियल टाइम इंर्फोमेशन मिलने लगती। आतंकी आपरेशनों के दौरान निश्चित तौर पर इसका लाभ होता है।अब जो भी सूचनाएं मिलती हैं वह आईबी या संबंधित राज्य की पुलिस से मिलती है। इनके पास फोन इंटरसेप्ट करने की पावर होती है।
इन संगठनों से इनपुट मिलने और उसे आपरेशन में लगे दल तक पहुंचाने की एक लंबी प्रक्रिया होती है।इस सूचना को समझने का भी एक प्रोटोकॉल होता है। कई बार देखने को मिला है कि आपरेशन के दौरान सीआरपीएफ अपने स्तर पर कुछ ऐसी सूचना जुटा लेती है, जो आईबी से नहीं मिलती। यहां दिक्कत यह है कि उस सूचना से जुड़े लोगों की कॉल इंटरसेप्ट करने के लिए बल के पास न तो उपकरण होते हैं और न ही अधिकार। नतीजा, बहुत कुछ हाथ से निकल जाता है।
आईपीएस बनाम कॉडर
सीआरपीएफ के पूर्व आईजी हरीश.स सूद का कहना है कि अर्धसैनिक बलों में सदैव आईपीएस और कॉडर अफसरों के बीच विवाद रहा है। चूंकि बल का सर्वोच्च पद यानी डीजी, वह आईपीएस के पास होता है। कॉडर अधिकारी जो अपनी 37-38 साल की सेवा के बाद मुश्किल से आईजी या एडीजी तक पहुंच पाता है। एडीजी भी अब पिछले कुछ सालों से बनाए जाने लगे हैं, नहीं तो इससे पहले यह पद भी आईपीएस के पास रहा है।
मौजूदा समय में देखे तो हर फोर्स में कोई इक्का-दुक्का एडीजी ही कॉडर अधिकारी होता है। इस बाबत अदालत में केस भी चल रहा है। सूद का कहना है कि गृह मंत्रालय में कॉडर अफसरों की कोई नहीं सुनता। उन्हें आईपीएस के नीचे ही चलना पड़ता है। आईपीएस अधिकारी जो दो-तीन साल के लिए किसी बल में आता है, जबकि कॉडर अफसर अपना पूरा सेवाकाल उसी फोर्स में बिताना है। कॉल इंटरसेप्ट करने के अधिकार की पैरवी यदि आईपीएस करें तो यह तुरंत मिल सकता है। जैसे ही फाइल ऊपर जाती है तो यह कह कर उसे वापस कर देते हैं कि इसका दुरुपयोग हो सकता है।
सीआरपीएफ में दो-तीन साल के लिए आने वाले डीजी आपरेशनों के लिए अपनी नई नीति बनाते हैं। इसका खामियाजा बल को भुगतना पड़ता है।कोई डीजी कहता है कि आपरेशनों में पैदल चलो, दूसरा कहता है बाइक ले लो, तीसरा बोलता है कि माइनिंग प्रोटेक्टिेड व्हीकल ठीक हैं। इसके बाद अन्य कोई डीजी अपनी नई बात ले आता है।अगर सीआरपीएफ को आतंकी और नक्सली इलाकों में 'कॉल इंटरसेप्शन' का अधिकार मिलता है तो उससे बल को बहुत ज्यादा मजबूती मिलेगी। इसके लिए सरकार को एक निगरानी तंत्र के ज़रिए यह अधिकार दे देना चाहिए।
बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी व एसएसबी के पास सर्विलांस का अधिकार नहीं है। के. विजय कुमार, एमएल कौमावत, रमन श्रीवास्तव और आशीष मित्रा आदि महानिदेशकों ने कई बार गृह मंत्रालय को यह अधिकार देने के लिए प्रपोजल भेजा था। बीएसएफ के रिटायर्ड आईजी आरसी चिलकोटी का कहना है कि एक तय सीमा में ही सही, लेकिन यह अधिकार मिल जाए तो आतंकी घटनाओं से बचने में खासी मदद मिलेगी। सीमा के चार-पांच किलोमीटर के दायरे में सर्विलांस सुविधा काफी कारगर हो सकती है।