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लोकसभा चुनाव में अहम होगी गठबंधनों की भूमिका, कांग्रेस ने गठबंधन किया होता तो अलग हो सकते थे नतीजे

Thu, 13 Dec 2018 04:13 AM IST
शरद गुप्ता, नई दिल्ली।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के दो प्रमुख संकेत हैं, राहुल गांधी अब अपने बूते कांग्रेस को चुनाव जिता सकते हैं और अगले चुनाव में गठबंधनों की बड़ी भूमिका होगी। यदि राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने गठबंधन किया होता तो नतीजे अलग होते।

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अगला चुनाव वही जीतेगा जिसका गठबंधन मजबूत होगा। भले ही तेलंगाना में टीडीपी और कांग्रेस का गठबंधन न जीत पाया हो लेकिन उसकी वजह केसीआर की लोकलुभावन योजनाएं हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में यदि उसने बसपा से गठबंधन किया होता तो नतीजे अलग होते। मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच केवल 0.1 फीसदी वोट का फर्क है जबकि सपा, बसपा और गोगपा को मिलाकर 7.5 फीसदी वोट मिले। इसी तरह राजस्थान में कांग्रेस-भाजपा के बीच 0.4 फीसदी वोट का अंतर है जबकि कांग्रेस के बसपा जैसे संभावित सहयोगियों को 5 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले।

 कांग्रेस के सामने अब गठबंधन मजबूत बनाने की चुनौती है, वहीं उसके संभावित सहयोगी ही उसकी ताकत बढ़ने नहीं देना चाहते। सपा के प्रवक्ता सुनील साजन ने साफ कहा कि यदि कांग्रेस ने हमें इन तीन राज्यों में कोई सीट नहीं दी, तो वह हमसे कैसे अपेक्षा कर सकती है कि हम लोकसभा चुनाव के दौरान उसे उत्तर प्रदेश में सीटें देंगे।
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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी से ही चुनाव नहीं जीत पाएंगे यदि हम उनकी मदद न करें। यदि सोमवार को दिल्ली में आयोजित विपक्षी दलों की बैठक में शामिल दल एक होकर लड़ें तो वे लोकसभा चुनाव में 543 में से 456 सीटों पर भाजपा के खिलाफ संयुक्त उम्मीदवार उतार सकते हैं लेकिन इसमें सबसे बड़ी अड़चन उनमें आपसी सामंजस्य की कमी और महत्वाकांक्षाएं हैं।

वहीं दूसरी ओर, इन चुनावों से राहुल गांधी मजबूत बनकर निकले हैं। पिछले वर्ष 11 दिसंबर को ही राहुल कांग्रेस अध्यक्ष बने थे। उसके बाद से गुजरात, कर्नाटक के अलावा इन पांच राज्यों के चुनाव हुए। गुजरात में कांग्रेस जीतते-जीतते हार गई। कर्नाटक में वह हार कर भी जीत गई। लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस अपने दम पर नहीं जीती थी और एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में चल रही कांग्रेस-जदएस की सरकार अंतर्विरोधों की वजह से कभी भी गिर सकती है।

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छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश की हार पिछले पांच सालों के दौरान मोदी-शाह के लिए सबसे बड़ा झटका है। वे दिल्ली हारे लेकिन वहां कांग्रेस नहीं जीती थी। भाजपा पंजाब में भी हारी थी लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की भारी जीत के आगे वह दब गई। वैसे भी पंजाब में अकाली दल ही हारा, भाजपा तो उसकी जूनियर सहयोगी थी।

इन तीन राज्यों में भाजपा मोदी, शाह और योगी के जबरदस्त प्रचार के बावजूद हार गई। इस दौरान योगी ने सबसे ज्यादा 74 जनसभाएं कीं जिसमें राजस्थान में 26, छत्तीसगढ़ में 23, तेलंगाना में 8 और मध्य प्रदेश में 17। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 56 जनसभा कीं, मध्य प्रदेश में 23, राजस्थान में 15, तेलंगाना में 10 और छत्तीसगढ़ में 8। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 रैलियां कीं, मध्य प्रदेश में 10, राजस्थान में 12, तेलंगाना में 5 और छत्तीसगढ़ में चार।

इन सबके बावजूद तेलंगाना में भाजपा केवल एक सीट जीतने में कामयाब हुई और छत्तीसगढ़ में 16। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी उसे हार मिली। राम मंदिर से लेकर बजरंग बली तक सभी का जिक्र किया गया लेकिन नतीजों से जाहिर है कि प्रखर हिंदुत्व का मुद्दा भी इन चुनावों को भाजपा के पक्ष में लाने में असफल रहा यानी शाह-योगी-मोदी भी भाजपा को चुनाव नहीं जिता सकते यदि एंटी इनकमबेंसी बहुत ज्यादा हो तो। लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए अब भाजपा को किसान, दलित और युवाओं को साधने की जरूरत है। साथ ही खुद से छटक रहे सहयोगी दलों की जगह नए दलों को शामिल करने पर भी ध्यान देना होगा। 
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