फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों को लग सकती है 'आर्थिक चपत', टेंशन वाली ये पॉलिसी बदलने को राजी नहीं है सरकार

Fri, 26 Feb 2021 04:09 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कार्मियों ने अपने मुख्यालयों से गुहार लगाई कि इस पॉलिसी को बदलवाया जाए। इसके लिए एक फोर्स के डीजी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र भी लिखा है। इसके बावजूद कोई राहत नहीं मिली। इनकी मांग है कि ये मकान कम से कम छह साल तक के लिए अलॉट होना चाहिए...
विज्ञापन
crpf - फोटो : पीटीआई (फाइल)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के योद्धाओं को बड़ी आर्थिक चपत लग सकती है। ये योद्धा कश्मीर, नक्सल और उत्तर-पूर्व के जोखिम भरे इलाकों में तैनात हैं। इनके परिवार सरकारी आवासों में रह रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी में स्थित ये आवास शहरी विकास मंत्रालय के तहत आते हैं। उक्त इलाकों में पोस्टिंग होने के बाद इन्हें तीन साल तक सरकारी मकान मिलता है। उसके बाद खाली करने का नोटिस थमा दिया जाता है।

विज्ञापन


ऐसे में हर माह 23 हजार रुपये से लेकर 28 हजार रुपये तक की पेनल्टी लगाए जाने का प्रावधान है। इस मामले में इन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से भी कोई राहत नहीं मिली। कोर्ट की तरफ से कहा गया है कि यह पॉलिसी मैटर है, इसमें दखलंदाजी नहीं की जा सकती। इन कर्मियों ने अपने महानिदेशकों को इस मामले से अवगत कराया है। पीएमओ के संज्ञान में यह मामला लाए जाने का प्रयास हुआ था, लेकिन वह फाइल बीच में ही रोक दी गई। अब किसी भी वक्त इन कार्मिकों पर पेनल्टी लग सकती है। दूसरी तरफ, इनकी टेंशन का कारण बनी 'पॉलिसी' को बदलने के लिए सरकार यानी गृह एवं शहरी विकास मंत्रालय राजी नहीं हैं।

इन अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, हमें मकान खाली करने का नोटिस मिल चुका है। इसका सीधा असर ड्यूटी पर पड़ रहा है। दिल्ली में पढ़ रहे बच्चों को एकाएक इन जोखिम भरे इलाकों में कैसे ले आएं। बहुत से अफसर, उग्रवादियों, नक्सलियों और दूसरे आतंकी समूहों के रडार पर होते हैं। चूंकि कई अफसर, आतंकियों के खिलाफ सर्च एवं एनकाउंटर जैसे ऑपरेशनों में शामिल होते हैं तो उन्हें हर समय अपने परिवार का ध्यान रखना पड़ता है।
विज्ञापन


ऐसे हालात में अगर ये अपने परिवार को साथ रखते हैं, तो वह जोखिम कई गुणा बढ़ जाता है। शहरी विकास मंत्रालय का 'डायरेक्टोरेट ऑफ एस्टेट' अपनी जिद पर अड़ गया है। पिछले साल मार्च में इन कर्मियों का अलॉटमेंट समय पूरा हो गया था। इन्हें तीस जून तक आवास खाली करने के लिए कहा गया। उसके बाद ये अफसर हाईकोर्ट चले गए। कई माह तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने कहा, ये पॉलिसी मैटर है। इसमें अदालत की दखलंदाजी ठीक नहीं है। इसके लिए संबंधित मंत्रालय ही कोई फैसला ले सकते हैं।

कार्मियों ने अपने मुख्यालयों से गुहार लगाई कि इस पॉलिसी को बदलवाया जाए। इसके लिए एक फोर्स के डीजी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र भी लिखा है। इसके बावजूद कोई राहत नहीं मिली। इनकी मांग है कि ये मकान कम से कम छह साल तक के लिए अलॉट होना चाहिए। वजह, जब इन योद्धाओं को जोखिम वाले क्षेत्रों में पोस्टिंग मिलती है तो उसका कार्यकाल तीन साल नहीं होता। वह छह साल से भी ज्यादा हो जाता है। ऐसे में वे अपने परिवार को न तो साथ ला सकते हैं तो न ही किसी दूसरी जगह पर भेज सकते हैं।

शहरी विकास मंत्रालय को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लिए कम से कम छह साल तक आवास रखने की पॉलिसी बनानी चाहिए। दूसरे सरकारी विभागों के कर्मियों और बलों के योद्धाओं को सभी बातों में एक समान नहीं माना जा सकता। सिविल महकमे के कर्मी दो साल की पोस्टिंग अवधि पूरी करने के बाद दोबारा से दिल्ली आ जाते हैं। ऐसे में उनका क्वार्टर सुरक्षित रहता है। उन्हें पेनल्टी का भी डर नहीं होता। अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने यह मामला पीएमओ तक पहुंचाने का प्रयास किया था, लेकिन उसे वहां तक नहीं जाने दिया गया। इस मामले में अगर पॉलिसी नहीं बदलती है तो केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के योद्धाओं को ड्यूटी के दौरान मानसिक परेशानी से गुजरना पड़ सकता है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें