फिलौरा जीतने के बाद सियालकोट की तरफ बढ़ते हुए जैसे ही पूना हॉर्स के टैंकों ने सीमा पार की, कमांडिंग ऑफिसर अदी तारापोर ने अपने नंबर 2 मेजर निरंजन सिंह चीमा को कोने में बुलाया। चीमा समझे कि वो युद्ध की रणनीति के बारे में बात करेंगे।
लेकिन तारापोर ने कहा, "अगर मैं लड़ाई में मारा जाता हूं तो मेरा अंतिम संस्कार यहीं युद्ध भूमि में किया जाए। मेरी प्रेयर बुक मेरी मां के पास भिजवा दी जाए और मेरी सोने की चेन मेरी पत्नी को दे दी जाए। मेरी अंगूठी मेरी बेटी और मेरा फाउंटेन पेन मेरे बेटे जर्जीस को दे दिया जाए। उससे कहा जाए कि वो भी मेरी तरह भारतीय सेना में जाए।"
घायल होने पर भी मैदान से नहीं हटे
पांच दिन बाद लेफ्टिनेंट कर्नल अदी तारापोर पाकिस्तानी टैंक के गोले का शिकार हो गए। इससे पहले भी उनकी बांह में टैंक के गोले का एक शार्पनल आकर लगा था जिससे उसमें एक गहरा घाव हो गया था।
उन्होंने इलाज के लिए वापस जाने से इंकार कर दिया था और अपनी बांह में स्लिंग लगाकर लड़ते रहे थे। तारापोर की बेटी जरीन जो इस समय पुणे में रहती हैं, वो बताती हैं, "चविंडा में उनके हाथ में स्नाइपर्स लगे थे। मेरे पिताजी बहुत वफादार व्यक्ति थे। अपने सिर पर वो अक्सर जिम्मेदारियां लिया करते थे। उन्हें लगा कि अगर वो जख्मी होने के कारण मैदान से हट गए तो उनके सैनिकों को कौन देखेगा।"
अपना टैंक लेकर खुद आगे आए
जरीन ने बताया, "वो बहुत बहादुर आदमी थे। मुझे उनके साथियों ने बताया कि उनको लगी चोट काफी गंभीर थी और वो दर्द से बचने के लिए मार्फीन के इंजेक्शन ले रहे थे। उस समय उनकी रेजिमेंट बहुत तेजी से अंदर जा रही थी और उन्हें लगता था कि अगर मैं हट गया तो उनकी रेजिमेंट की तेजी भी घट जाएगी।"
अदी तारापोर के उस समय के साथी कैप्टन अजय सिंह जो बाद में लेफ्टिनेंट जनरल और असम के राज्यपाल बने, याद करते हैं, "ब्रिगेडियर केके सिंह ने आदेश दिया कि पूना हॉर्स चविंडा के आसपास एक रिंग डालेगी। 14-15 तारीख को हमने जसोरन और वजीरवाली पर कब्जा कर लिया। फिर मेरी स्क्वाड्रन को काम दिया गया कि हम भुट्टोडोगरानी पर कब्जा करें। इस समय मेरे पास सात टैंक थे।"
टैंक पर सवार तारापोर
अजय सिंह बताते हैं, "हमने उनको और 9 गढ़वाल की इंफैंट्री को साथ लिया और उस पर कब्जा कर लिया। थोड़ी देर बाद पाकिस्तानियों का जवाबी हमला आ गया टैंकों के साथ जिसमें हमारी और उनकी बहुत कैजुएल्टी हुई। मैंने सीओ साहब को एसओएस भेजा कि जल्दी से जल्दी और टैंक भेजें। उन्होंने आसपास खड़े सारे टैंकों को जमा किया और अपना टैंक लेकर खुद आ गए और मेरे बगल में पोजीशन लेकर पाकिस्तानियों पर फायर करने लगे।"
अजय सिंह आगे कहते है, "उसी दौरान उन्हें पाकिस्तानी टैंक का गोला लगा जिससे वो घायल हो गए। शाम को हमें पता चला कि वो घायल नहीं हुए हैं बल्कि उनकी मौत हो गई है। वो जिस टैंक पर चलते थे, उसका नाम खुशाब था। वो चूंकि हिट हो चुका था और स्टार्ट नहीं हो रहा था। इसलिए हमें उसे वहीं छोड़कर आना पड़ा। उस टैंक को पाकिस्तानी उठाकर ले गए जो अब भी उनके वॉर मेमोरियल में रखा हुआ है।"
हमेशा कपोला के ऊपर खड़े रहते थे तारापोर
तारापोर अपने टैंक के कपोला पर खड़े होकर युद्ध भूमि का मुआयना करते थे। आखिरी दिनों में उनका बांया हाथ भी स्लिंग में बंधा हुआ था।
जरीन बताती हैं, "आमतौर से युद्ध के मैदान में कपोला बंद कर लड़ाई होती है लेकिन उन्होंने कभी भी अपना कपोला बंद नहीं किया। उन्हें देखकर उनके जूनियर्स भी अपना कपोला खुला रखते थे। जब वो इस तरह आगे गए तो पाकिस्तानी सैनिक भी आश्चर्य में पड़ गए कि सब लोग सिर ऊपर किए हुए चले आ रहे हैं।"
जनरल अजय सिंह याद करते हैं, "वो कपोला में इसलिए नहीं घुसते थे क्योंकि उनका मानना था कि कमांडर को हमेशा दिखाई देते रहना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो तो उसके और दूसरे टैंकों में फर्क क्या रह जाएगा। वो हमेशा ऊपर काला चश्मा लगाकर ये दिखाने के लिए खड़े रहते थे कि मैं तुम्हारे साथ हूं। उनको डर तो लगता ही नहीं था।"
ग्रेनेड से बचाया
कर्नल तारापोर पूना हॉर्स में संयोगवश ही आए थे। वो हैदराबाद स्टेट की सेना में काम करते थे। एक बार भारतीय स्टेट फोर्सेज के कमांडर इन चीफ मेजर जनरल एल एदरोस उनकी बटालियन का निरीक्षण कर रहे थे।
ग्रेनेड फेंकने के अभ्यास के दौरान एक युवा सिपाही घबरा गया और उसने वो ग्रेनेड उस स्थान पर फेंक दिया जहां बहुत से लोग बैठे हुए थे। इससे पहले कि वो फटता तारापोर बिजली की तेजी से दौड़े और ग्रेनेड को उठाकर दूसरी तरफ फेंक दिया। फेंकने से पहले ही वो ग्रेनेड उनके हाथों में ही फट गया और उसके शार्पनेल उनके सीने में घुस गए।
हैदराबाद का भारत में विलय
जरीन बताती हैं, "कुछ दिनों बाद जब वो ठीक हो गए तो जनरल एदरोस ने उन्हें बुलावा भेजा। उन्होंने उनसे पूछा कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं। तारापोर ने कहा कि उनका तबादला आर्म्ड डिवीजन में कर दिया जाए। दूसरे दिन मेरे पिताजी का तबादला हैदराबाग लांसर्स में कर दिया गया। आजादी के बाद जब हैदराबाद का भारत में विलय हुआ तो उन्हें पूना हॉर्स में तैनात किया गया।"
कर्नल तारापोर की बहादुरी का जिक्र करते हुए जनरल अजय सिंह कहते हैं, "उनको भुट्टोडोगरानी में खुद आने की क्या जरूरत थी? वो किसी और स्क्वाड्रन को वहां नहीं भेज सकते थे? मुझे याद है लड़ाई के दौरान मेरे साथी अफसर ने उनसे कहा कि आप अपनी पोजीशन बदलकर कवर में चले जाइए। उन्होंने कहा नहीं। जहां तुम रहोगे वहां मैं रहूंगा। अगर तुम्हें गोला लगेगा तो मुझे भी गोला लगेगा।"
नेपोलियन थे उनके हीरो
लड़ाई के दौरान उनकी कमांड का लोहा उनका सामना कर रहे पाकिस्तानियों ने भी माना था।
1965 में पाकिस्तानी सेना के निदेशक, मिलिट्री ऑपरेशन, गुल हसन खां ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "25 केवेलरी के कमांडर कर्नल निसार खां ने मुझे बताया था कि तारापोर के वायरलेस इंटरसेप्ट को सुनना... हम लोगों के लिए बहुत बड़ी सीख होती थी। उनका अपने लोगों को कमांड देना सुनते ही बनता था।"
जरीन बताती हैं कि उनके पिता के हीरो नेपोलियन थे। उनके पास नेपोलियन पर बहुत सी किताबें थी। उन्हें संगीत का भी बहुत शौक था। हर रात को वो अंग्रेजी क्लासिकल संगीत सुना करते थे। कर्नल तारापोर चाइकोस्की को बहुत पसंद करते थे।
गणतंत्र दिवस पर...
लेफ्टिनेंट जनरल चीमा की पत्नी ऊषा चीमा बताती हैं, "65 की लड़ाई पर जाने से पहले मैं अपने पति को पूना रेलवे स्टेशन छोड़ने आई थी। ट्रेन छूटने ही वाली थी कि तारापोर मेरे पास आए। बोले ऊषा तुम चिंता मत करो मैं निरंजन (मेरे पति) का ख्याल रखूंगा। उन्होंने अपना वादा पूरा किया। मेरे पति लड़ाई से सुरक्षित वापस लौटे लेकिन तारापोर हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए।"
कर्नल तारापोर की बेटी जरीन को अभी तक याद है, "1966 के गणतंत्र दिवस पर हम दिल्ली गए थे। मेरी माताजी को कर्नल ऑफ द रेजीमेंट के पास बैठाया गया था। हम बच्चे लोग आगे के इनक्लोजर में थे। मेरी मां 41 साल की थीं। जब उनका साइटेशन पढ़ा गया तो वो हम सब लोगों के लिए बहुत मुश्किल और भावुक क्षण था जब राधाकृष्णन ने पुरस्कार देने के बाद संवेदना में मेरी मां के हाथ को थपथपाया। माहौल इस तरह का हो गया कि हम अपने आंसू नहीं रोक पाए।"