भारत में दिल के मरीजों और दिल की बीमारी से मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। पिछले 15 सालों में अमेरिका में जहां दिल की बीमारी से पीड़ित और मरनेवाले लोगों की संख्या में जबरदस्त कमी देखी गई है वहीं भारत में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अमेरिका में 1990 से 2016 के बीच कार्डियोवस्कुलर डिजीज से मरने वालों की संख्या में 41 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है जबकि भारत में 34 फीसदी बढ़े हैं। अमेरिका के कॉलेज ऑफ कार्डियोलोजी के जरनल में प्रकाशित शोध के मुताबिक 16 वर्षों में दोनों देशों में दिल के मरीजों में बहुत उतार चढ़ाव देखने को मिला है। शोध में बताया गया है कि भारत में 1990 में जहां एक लाख लोगों में 115.7 लोग दिल के मरीज हुआ करते थे वह 2016 तक 209.1 फीसदी हो गए हैं।
बढ़ते दिल के मरीजों की संख्या देखते हुए अमेरिका ने जनसंख्या के आधार पर पॉलिसी बनाई तंबाकू सेवन, हाई कॉलेस्ट्रॉल और बल्ड प्रेशर नियंत्रण के लिए काम किया गया जिसके बाद वहां बड़ी संख्या में सीवीडी के मरीजों में कमी देखी गई।
शोध में कहा गया है कि समय आ गया है कि भारत सरकार भी दिल की बीमारी से होने वाली असमय मृत्यु रोकने के लिए पॉलिसी बनाने की जरूरत है जिसमें हेल्दी लाइफस्टाइल के लिए गाइडलाइन जारी करने की जरूरत है।
सिर्फ 2016 में कार्डियोवस्कुलर डिजीज की वजह से भारत में जहां लगभग 62.6 मिलियन लोगों की असमय मृत्यु हुई वहीं अमेरिका में यह आंकड़ा पिछले सालों की तुलना में घटकर 12.7 मिलियन पर पहुंच गया। डब्ल्यू एचओ ने 2025 तक असमय होने वाली मृत्यु को 25 फीसदी तक घटाने का टार्गेट रखा है।
आंकड़े चौंकाते हैं कि भारत में दिल का दौरा पड़ने से असमय होने वाली मृत्युदर की तुलना में 15-20 फीसदी है जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 6 से 9 फीसदी है। शोध में यह भी पता चला है कि दिल की बीमारी से सबसे ज्यादा बीमार पंजाब है वहीं मिजोरम में दिल के मरीजों की संख्या सबसे कम पाई गई है। कुछ इसी तरह पश्चिम बंगाल में दिल के मरीजों डायलिसिस की संख्या बढ़ी है वहीं मिजोरम में कम है।