अभी बहुत से लोग मनरेगा के चक्कर में गांव जा रहे हैं, लेकिन आगे चलकर इसमें भी कामगारों की एक सीमा तय की जा सकती है।
कोरोना की वजह से देश में जो अनिश्चितता का माहौल बना है, उसे खत्म करने के लिए केंद्र और राज्य, दोनों को साथ मिलकर काम करना होगा। एसपी शर्मा के अनुसार, केंद्र को कुछ ऐसे पैकेज देने होंगे, जिससे कि उद्योग धंधा शुरू करने वाले लोगों में उत्साह दिखाई दे।
राज्य सरकार को बिना किसी देरी के केंद्र की घोषणाओं को लागू करना चाहिए। इतना ही नहीं, अगर कुछ नियमों में ढील देनी पड़े तो वह भी दी जाए। वजह, ये ऐसा वक्त है कि जिसमें मैन पावर और पैसा, दोनों की भारी कमी है।
आने वाले दिनों में अगर कोरोना पर जल्द ही काबू पा लिया जाता है, तो ही कारोबार शुरू हो सकेगा। इसमें विश्चास बहाली एक बड़ा पहलू रहेगा। वर्क फोर्स को समय पर वेतन और दूसरी सुविधाओं का भरोसा दिलाना होगा।
खासतौर पर, काम के दौरान बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना और बीमा पॉलिसी, जैसी बातों का ध्यान रखना पड़ेगा। इसमें पांच-छह माह लग सकते हैं।
शहर की वर्क फोर्स अब अपने गांव जाना चाह रही है। जिस भी स्टेशन से श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलती है, वहां मजदूरों की भीड़ लगी है। ये सभी वो मजदूर हैं, जिन्हें शहरी कारोबार की ड्राइविंग फोर्स कहा जाता है। अब इन्हें किसी भी तरह अपने गांव जाना है।
लॉकडाउन के दौरान 'मनरेगा' योजना ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों के लिए रोजी-रोटी बनी है। केंद्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि लॉकडाउन में दो करोड़ से अधिक ग्रामीण मजदूरों को इसका फायदा पहुंचा है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोरोना वायरस महामारी और उसके आर्थिक प्रभाव से निपटने को लेकर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 1.70 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी।
गृह मंत्रालय की संयुक्त सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव के अनुसार, केंद्र एवं राज्य सरकारों के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में दो करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है।
अब जिस तरह से गांव में लोगों की भीड़ बढ़ रही है, उसके मद्देनजर मनरेगा भी ओवरलोड हो जाएगी। इससे गांव में रोजगार का संकट खड़ा होगा। एसपी शर्मा बताते हैं कि मनरेगा में रोजगार के सीमित अवसर हैं।
योजना तो एक ही है। वह चाहे केंद्र की हो या राज्य की। यूपी के अतिरिक्त मुख्य सचिव (होम) अवनीश अवस्थी के अनुसार, यूपी में पिछले दो माह के दौरान 6 लाख से अधिक मजदूर आ चुके हैं।
अप्रैल के तीसरे सप्ताह में आठ हजार पंचायतों में करीब 130000 अकुशल मजदूर पंजीकृत थे, जबकि अब वह 37694 पंचायतों में यह संख्या 15 लाख के पार हो गई है। रोजाना यह ग्राफ ऊपर जा रहा है।
अब कई राज्यों की ओर से यह मांग आने लगी है कि दूसरे राज्यों से आ रहे मजदूरों की गति को कम किया जाए। उनके लिए क्वारंटीन सेंटर एवं दूसरी सुविधाएं कम पड़ने लगी हैं। कर्नाटक के सीएम बीएस येदियुरप्पा अपने राज्य से खाली ट्रेनें वापस लौटा दी हैं। उनका कहना था कि हम मजदूरों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराएंगे।
इसी तरह तेलंगाना के सीएम केसीआर ने कहा, यूपी व बिहार की ओर से कहा गया है कि मजदूरों को भेजने की रफ्तार धीमी करें। स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव कहते हैं कि मजदूरों को रोकने का मतलब उन पर अपनी मनमर्जी थोपना है।
लोकतंत्र में उन्हें बंधुआ मजदूर बनाया जा रहा है। सरकारों ने मजदूरों की आज जो हालत की है, उससे उनका भरोसा टूट गया है। आप उन्हें जबरन नहीं रोक सकते। पुलिस की मदद से उन्हें रोकने का प्रयास करेंगे तो उसके दूरगामी नतीजे सामने आएंगे।
राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट कह चुके हैं कि अप्रैल में मनरेगा के तहत रोजगार पाने वाले मजदूरों की संख्या लगभग 62 हजार थी। अब वह संख्या 12 लाख के पार पहुंच गई है। इसी तरह से दूसरे राज्यों में भी मनरेगा पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है।
जिस तरह से मजदूरों की ट्रेन पहुंच रही हैं, उसी तरह रोजगार लेने वालों की सूची भी लंबी होती जा रही है। एसपी शर्मा कहते हैं कि ये सब अभी चलेगा। कुछ माह बाद गांव में जब कामधंधे के सभी रास्ते बंद हो जाएंगे तो उन्हें शहर में आना पड़ेगा। गांव में एक सीमा से ज्यादा रोजगार सृजित नहीं कर सकते।