The Accidental Prime Minister
चूंकि फिल्म के उस दो मिनट पांच सेकेंड के ट्रेलर ने भारी विवाद को जन्म दे दिया है जो थमने का नाम नहीं ले रहा है। फिल्म के कुछ सीन पर जब इतना बबाल हो तो फिल्म का अंजाम क्या होगा। फिल्म में मनमोहन सिंह का किरदार निभा रहे अनुपम खेर पर भी कई समर्थकों ने केस दर्ज कर दिय है।
बता दें कि विवाद बढ़ने पर फिल्म के ट्रेलर को यू ट्यूब से हटा दिया गया जिसके बाद फिल्म में डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका निभा रहे अनुपम खेर ने आपत्ति जताई है। अनुपम ने ट्वीट कर यूट्यूब से मदद मांगी है। उन्होंने यू ट्यूब को लिखा है कि उन्हें देश के कई हिस्सों से लोगों ने फोन व मैसेज करके बताया है कि सर्च में ट्रेलर ऑफ द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर टाइप करने पर यह या तो दिख नहीं रहा है या 50वें स्थान पर नजर आ रहा है, जबकि हम पहले स्थान पर ट्रेंड कर रहे हैं।
हालांकि ट्रेलर यू ट्यूब पर है। ट्रेलर के रिलीज होने के चंद घंटे के भीतर ही जहां इसे करोड़ लोगों ने देखा और लाखों लोगों ने शेयर किया है जबकि अब तक चार करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। इसे पसंद और नापसंद करने वाले लोगों के बीच ऑनलाइन बहस भी जोरदार तरीके से जारी हैं और इसपर तीखी राजनीतिक बहस भी हो रही है।
सेंसर बोर्ड ने फिल्म में लगाए कई कट
द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर को सेंसर बोर्ड ने यू सर्टीफिकेट दिया है। किताब और संबंधित रिसर्च मैटेरियल को देखकर बोर्ड ने इसे सर्टीफिकेट जारी किया। हालांकि, फिल्म में कुछ सीन कट किए गए हैं और कई जगह पर बीप का भी इस्तेमाल किया गया है। बोर्ड ने सर्टीफिकेट जारी करने से पहले न केवल काफी रिसर्च मांगी बल्कि कई सीन को लेकर निर्देशक से सवाल भी किए।
इस फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे हैं। फिल्म की पटकथा मयंक तिवारी ने लिखी है। अनुपम खेर, अक्षय खन्ना और आहना कुमरा फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं। इस फिल्म में मनमोहन व सोनिया के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी, राहुल गांधी व लालू प्रसाद यादव के भी किरदार हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठा है कि क्या इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का किरदार भी देखने को मिलेगा।
The Accidental Prime Minister
जब भी फिल्मों के विरोध की बात होती है सबसे पहले 1975 में बनी फिल्म आंधी का जिक्र जरूर होता है। इंदिरा गांधी ने खुद इसे इमरजेंसी के दौरान प्रतिबंधित कर दिया था। बाद में 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी फिर इसे रिलीज किया गया, लेकिन 1980 में इंदिरा फिर सत्ता में आ गईं।
1975 में जनता पार्टी के सांसद अमृत नाहटा द्वारा निर्देशित फिल्म किस्सा कुर्सी का के तो मास्टर प्रिंट सहित सभी कॉपियां इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के समर्थकों ने जला दी थीं। यह फिल्म इंदिरा गांधी व संजय गांधी की कार्यशैली को लेकर बनाई गई थी। मामला कोर्ट तक पहुंचा था और फिल्म को पूरी तरह से नष्ट करने पर संजय गांधी व तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला को सजा भी हुई थी। हालांकि बाद में यह फैसला रद्द हो गया। नाहटा ने 1978 में इस फिल्म को नए कलाकारों के साथ बनाया। लेकिन 1980 में कांग्रेस की फिर सत्ता में वापसी हो गई। बाद मे खुद नाहटा कांग्रेस में शामिल हो गए।
इनके अलावा गुजरात दंगों पर बनी फाइनल सोल्युशन, इंदिरा गांधी की हत्या पर बनी कौम दे हीरे के अतिरिक्त मोहल्ला अस्सी, केदारनाथ व पद्मावत सहित कई फिल्मों पर विरोध के बाद या तो प्रतिबंध लगा या काट-छांट के बाद रिलीज करना पड़ा।
फिल्म का विरोध होने पर बोले अनुपम खेर बोले- वोटर के रूप में सिनेमा देखने नहीं जाएंगे लोग
फिल्म का लगातार विरोध होने के बाद अनुपम खेर सामने आए हैं और उन्होंने कहा कि सिनेमाघरों में जो लोग इस फिल्म को देखने जाएंगे वे सिने प्रेमी होंगे। वे एक वोटर के रूप में सिनेमा देखने नहीं जाएंगे।
लेकिन जब वे लौटेंगे तो उनके दिलो दिमाग में यह फिल्म जरूर छपी होगी। उन्होंने आगे लिखा है कि सिनेमा और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि वे एक दूसरे का प्रतिबिंब हैं। वह आगे कहते हैं कि एक कलाकार यह नहीं बता सकता कि कोई किसी दल को वोट क्यों दे रहा है। कुछ वोटर पार्टी के लिए समर्पित होते हैं, जबकि कुछ अच्छे और बुरे की लिस्ट बनाकर पार्टी या सरकार चुनते हैं। इसमें एक फिल्म कितना योगदान दे सकती है? यह फिल्म एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे व्यक्ति की कहानी है जो अपनी काविलियत से दुनिया का एक बेहतरीन अर्थशास्त्री के साथ प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचा है।
राजीव गांधी की हत्या पर दक्षिण में बनी फिल्म कुत्तरापथिरिकल को भी प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। 1993 में बनी फिल्म 2007 में रिलीज हो सकी। 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व में दोबारा यूपीए सत्ता में आई।
मधुर भंडारकर की 2017 में इमरजेंसी पर बनी इंदु सरकार को भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। यह बात चौंकाती है कि 2018 में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में तीन राज्यों में विजय हासिल की। लोकसभा के चुनाव को बस कुछ महीने ही रह गए हैं।