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चाय नहीं बनाई तो हथौड़े से पत्नी की हत्या, बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा: बीवी गुलाम नहीं

Thu, 25 Feb 2021 04:57 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

- बॉम्बे हाईकोर्ट ने दंपती की छह वर्षीय बेटी के बयान को माना भरोसेमंद
- निचली कोर्ट ने 2016 में दोषी संतोष अख्तर को सुनाई थी 10 साल की सजा
 
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बॉम्बे हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी कोई गुलाम या कोई वस्तु नहीं है। वह यदि पति के लिए चाय बनाने से इनकार करे तो उसे पीटने के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या के मामले में 35 वर्षीय एक व्यक्ति को दोषी मानने के निचली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। 

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विवाह समानता पर आधारित साझेदारी
न्यायमूर्ति रेवती मोहिते देरे ने इस महीने की शुरुआत में पारित आदेश में कहा कि विवाह समानता पर आधारित साझेदारी है, लेकिन समाज में पितृसत्ता की अवधारणा अब भी कायम है और अब भी यह समझा जाता है कि महिला पुरुष की संपत्ति है, जिसकी वजह से पुरुष यह सोचने लगता है कि महिला उसकी ‘‘गुलाम’’ है।

छह साल की बेटी को माना भरोसेमंद
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि दंपती की छह वर्षीय बेटी का बयान भरोसा करने लायक है। अदालत ने 2016 में निचली कोर्ट द्वारा संतोष अख्तर (35) को दी गई 10 साल की सजा बरकरार रखी। अख्तर को गैर इरादतन हत्या का दोषी ठहराया गया है। दिसंबर 2013 में अख्तर की पत्नी उसके लिए चाय बनाए बिना बाहर जाने की बात कर रही थी, जिसके बाद अख्तर ने हथौड़े से उसके सिर पर वार किया और वह गंभीर रूप से घायल हो गई।
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नहलाकर अस्पताल में भर्ती कराया
मामले की विस्तृत जानकारी और दंपती की बेटी के बयान के अनुसार, अख्तर ने इसके बाद घटनास्थल से खून को साफ किया, पत्नी को नहलाया और उसे फिर से अस्पताल में भर्ती कराया। महिला की करीब एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहने के बाद मौत हो गई।

बचाव में यह दलील दी थी
बचाव पक्ष ने दलील दी कि अख्तर की पत्नी ने उसके लिए चाय बनाने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण उकसावे में आकर उसने यह अपराध किया। अदालत ने यह तर्क स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि किसी भी तरह से यह बात स्वीकार नहीं की जा सकती कि महिला ने चाय बनाने से इनकार करके अपने पति को उकसाया, जिसके कारण उसने अपनी पत्नी पर जानलेवा हमला किया।

इसलिए खुद को श्रेष्ठ समझने लगते हैं पति
अदालत ने कहा कि महिलाओं की सामाजिक स्थितियों के कारण वे स्वयं को अपने पतियों को सौंप देती हैं। उसने कहा कि इसलिए इस प्रकार के मामलों में पुरुष स्वयं को श्रेष्ठतर और अपनी पत्नियों को गुलाम समझने लगते हैं।

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