सिख संस्थाओं ने 1984 दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलवाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आज तक न कोई राजनेता दंडित हुआ है, न कोई पुलिस अधिकारी और न ही कोई सरकारी अफसर। इसलिए, 1984 के उन दिनों के बारे में जितना लिखा जाए, जितनी बार लिखा जाए, कम होगा।
हर वर्ष इस सप्ताह मेरी आंखों के सामने वह दृश्य लौटकर आते हैं, जो 33 वर्ष पूर्व मैंने अपनी आंखों से दिल्ली की गलियों में देखे थे। ऐसा लगता है, जैसे वे दर्दनाक घटनाएं कल हुई हों। वे यादें इतनी ताजा हैं कि मुझे फिर से दिखती हैं सड़कों पर पड़ी हुईं वे लावारिस लाशें, वे जली हुई, बर्बाद बस्तियां, वे डर के मारे भागते सिख परिवार।
हर वर्ष इस सप्ताह मैं अपने आपसे वही सवाल करती हूं, जो इतने वर्षों से करती आई हूं कि इस महीने के पहले सप्ताह में कैसे हुआ कि 3,000 से ज्यादा सिख तीन दिनों में भारत की राजधानी में मारे गए हों और अभी तक न्याय की संभावना भी न दिखती हो? इस सवाल से जुड़ा एक दूसरा सवाल है, जो मुझे परेशान करता रहता है कि इस नरसंहार को कैसे मेरे पत्रकार बंधु दंगा-फसाद कहते आए हैं?
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मेरी उम्र के पत्रकारों ने अपनी आंखों से देखा होगा किस सुनियोजित ढंग से कांग्रेस ने इस नरसंहार को करवाया था, फिर भी इनमें से शायद ही कोई होगा, जो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई इस हिंसा को दंगा न कहता हो। ये वही पत्रकार हैं, जिन्होंने 2002 के गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी पर बार-बार कीचड़ फेंका है। इसमें से कुछ ऐसे हैं, जो व्यक्तिगत तौर पर मोदी को उस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराते आए हैं, लेकिन इनमें से एक ने भी कभी राजीव गांधी पर 1984 वाले नरसंहार का दोष नहीं थोपा है।