हालांकि तालिबानियों ने जो ऑफर अफगानिस्तान की सेना में काम करने वाले जवानों और अधिकारियों को दिया है उसमें एक शर्त भी लगा दी है। शर्त यह है कि इन सभी जवानों और सैनिकों को तालिबानी लड़ाकों के अंडर में रहकर काम करना होगा। यानी कि अफगान के पूर्व सेना के अधिकारी और जवानों को गोरिल्ला युद्ध करने वाले तालिबानी लड़ाकों के नीचे रहकर काम करना होगा। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है की इस ऑफर के तहत अंडर ग्राउंड हो चुकी ज्यादातर अफगान सेना और जवानों का तालिबानियों के साथ मिलकर काम करने में उत्साह नहीं दिखेगा और न ही वह उनके साथ काम करने के इच्छुक होंगे। दरअसल तख्तापलट के बाद से ही अफगान की ज्यादातर सेना और उनके जवान पूर्व उपराष्ट्रपति सालेह के साथ ही जुड़ गए। इनमें से बहुत से जवान और सैनिक तो पंजशीर घाटी से ही तालिबानियों का मुकाबला भी कर रहे थे।
तालिबानियों के इस ऑफर को लेकर सबसे ज्यादा झटका चीन और पाकिस्तान को लगा है। रक्षा मामलों के जानकार कर्नल जीडी पुरी कहते हैं कि कि दरअसल नाटो सेना के अंडर में काम करने वाले अफगानिस्तान के इन सैनिकों का झुकाव तालिबानियों की बजाय अफगानिस्तान और इनको ट्रेंड करने वाले देशों के प्रति भी बना हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान और चीन को इस बात का डर सता रहा है कि अगर अफगानिस्तान की सेना में काम कर चुके सैनिक और जवान तालिबानियों के साथ मिलकर काम करेंगे तो इन जवानों और सैनिकों के मन में चीन और पाकिस्तान के प्रति कभी भी सहानुभूति की भावना नहीं बन पाएगी। दोनों मुल्कों को इस बात का डर बना हुआ है कि बहुत से सैनिक नाटो देशों के खुफिया एजेंट भी हो सकते हैं। जो तालिबान के साथ जुड़कर अन्य मुल्कों के साथ तमाम खुफिया जानकारियां भी साझा करेंगे।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि खुफिया जानकारी साझा करने को लेकर चीन और पाकिस्तान उतना डरा नहीं है जितना इस बात को लेकर डरा हुआ है कि पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह के वफादार सैनिकों को तालिबान अपने साथ जोड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है, पाकिस्तान को इस बात का अंदाजा है कि तालिबानियों का एक बड़ा धड़ा पाकिस्तान को अफगानिस्तान में सीधे दखल देने पर नापसंद करता है। इसीलिए अगर पाकिस्तानियों को नापसंद करने वाला एक और बड़ा सैनिक ग्रुप तालिबान के साथ मिल जाता है तो यह पाकिस्तान के साथ चीन के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।