बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि केवल तत्काल तीन तलाक ही अपराध की श्रेणी में है, तलाक की इस्लामी पारंपरिक विधि ‘तलाक-ए-अहसन’ को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। तलाक-ए-अहसन के तहत एक बार तलाक कहा जाता है
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया कि केवल तत्काल तीन तलाक ही अपराध की श्रेणी में है, तलाक की इस्लामी पारंपरिक विधि ‘तलाक-ए-अहसन’ को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। तलाक-ए-अहसन के तहत एक बार तलाक कहा जाता है, जिसके बाद महिला को इद्दत या तीन महीने की प्रतीक्षा अवधि से गुजरना पड़ता है। अदालत ने एक व्यक्ति और उसके माता-पिता के खिलाफ उसकी पत्नी की शिकायत पर दर्ज मामला खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच के जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस संजय देशमुख ने कहा कि मुस्लिम महिला विवाह के अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, 2019 केवल तत्काल तीन तलाक को ही अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। इस तरह के तलाक को तलाक-ए-बिद्दत या ट्रिपल तलाक कहते है। बता दें कि कोर्ट का यह निर्णय उस मामले में आया, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति और उसके माता-पिता पर 2019 के कानून के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी, जबकि व्यक्ति ने तलाक-ए-अहसन की प्रक्रिया अपनाई थी।
कुछ महीनों में हो गया था मतभेद...
पति-पत्नी की शादी वर्ष 2020 में हुई थी। कुछ महीनों तक साथ रहने के बाद वैवाहिक मतभेद उत्पन्न हो गए थे। दिसंबर 2023 में पति ने तलाक-ए-अहसन के तहत एक बार तलाक बोला और गवाहों की उपस्थिति में नोटिस भेजा। 90 दिन की इद्दत अवधि के दौरान पति-पत्नी ने पुनः साथ नहीं रहना शुरू किया, जिससे तलाक प्रभावी हो गया।