स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने 'अमर उजाला' से बातचीत में आरोप लगाया कि मंगलवार को कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक विवादित ट्वीट किया गया। इसमें हिंदू संतों का उपहास उड़ाते हुए कहा गया कि एक हिंदू संत के 50 से ज्यादा बच्चे हैं। उन्होंने कहा कि ये बच्चे किसी संत के जैविक पुत्र नहीं होते, बल्कि उनके शिष्य होते हैं। सनातन धर्म की संत परंपरा में सन्यास ग्रहण करने के बाद पिता के नाम के स्थान पर गुरु का नाम लिखा जाता है। इसी गुरु के नाम के आधार पर संतों और उनके शिष्यों का आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र बनाया जाता है। यही कारण है कि कई बार गुरु की उम्र 50-55 वर्ष होने के बाद भी उनके शिष्य की उम्र 48-50 वर्ष हो सकती है, क्योंकि लोग अपने जीवन में अलग-अलग समय पर सन्यास ग्रहण करते हैं।
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हिंदू संत जितेंद्रानंद सरस्वती ने आरोप लगाया कि विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान पर राजनीतिक लाभ लेने के लिए कांग्रेस और राहुल गांधी ने जानबूझकर हिंदू संतों का अपमान किया और एक संत के 50 से अधिक जैविक बच्चे होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह संतों का अपमान है और इसके विरुद्ध वे कांग्रेस और राहुल गांधी पर मुकदमा दर्ज कराएंगे। इसके पहले बुधवार 13 अगस्त को वे लखनऊ में चुनाव आयोग के कार्यालय जाकर अपना पक्ष रखेंगे।
क्या है मामला
कथित तौर पर विवादित पोस्ट में वाराणसी के एक प्रसिद्ध हिंदू संत स्वामी राम कमल दास के 50 बच्चे होने की बात कही गई है। राम कमल दास बड़े संत हैं और देश-विदेश में कथा वाचन करते हैं। इसके पहले भी एक बार कुछ लोगों ने यह विषय उठाकर राम कमल दास के पास अधिक बच्चे होने की बात कही थी, लेकिन स्वामी राम कमल दास के आश्रम के संत राम भरत शास्त्री ने इस पर जवाब दिया था।
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उन्होंने बताया था कि उनके आश्रम में 48 शिष्य रहते हैं। इनके पिता-संरक्षक के नाम के आगे दीक्षा देने वाले गुरु स्वामी राम कमल दास का नाम अंकित है। पिता-संरक्षक के नाम के स्थान पर स्वामी राम कमल दास का नाम अंकित होने का यह अर्थ कतई नहीं है कि वे उनके जैविक पिता हैं। लेकिन कांग्रेस सहित तमाम लोगों ने इसे उपहास का विषय बनाया और इस पर सोशल मीडिया में पोस्ट कर संतों को अपमानित करने का काम किया। उन्होंने कहा कि यह हिंदू संत परंपरा के अनुरूप है और किसी भी सरकार के दौरान इस विषय पर कभी विवाद नहीं हुआ। लेकिन अब एक राजनीति के कारण हिंदू संतों को निशाना बनाया जा रहा है।
उनके मामले में भी हुआ यही काम
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने अमर उजाला से कहा कि दीक्षा लेने से पूर्व उनका नाम जितेंद्र पाठक था। उनके पहचान पत्र पर उनके जैविक पिता का नाम अंकित था। लेकिन संन्यास दीक्षा लेने के बाद उनका नाम दंडी स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती हो गया और उनके अभिभावक के नाम के स्थान पर उनके गुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती लिखा गया। उन्होंने इसे हिंदू संत परंपरा बताते हुए कहा कि इसका हर सरकार, संवैधानिक संस्था सम्मान करती है, लेकिन कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस पर आपत्तिजनक बयानबाजी की और संतों का अपमान किया। इस पर वे कार्रवाई करेंगे।