बड़े संवैधानिक मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ के फैसले निर्णायक होते हैं। शीर्ष अदालत में प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ को ऐसे ही संवेदनशील मुद्दे- समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता के सवाल पर फैसला सुनाना है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, 17 अक्तूबर को इस मामले पर बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाएगी।
10 दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर चुकी पीठ ने 11 मई को फैसला सुरक्षित रखा था। सीजेआई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली इस पीठ में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा भी हैं। संविधान पीठ में 10 दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया था।
18 अप्रैल को शुरू हुई सुनवाई
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, सूत्रों ने कहा कि फैसला मंगलवार को सुनाया जाएगा। इसके बाद फैसले से जुड़ी अहम जानकारी शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपडेट की जाएगी। बता दें कि शीर्ष अदालत ने 18 अप्रैल को मामले में दलीलें सुनना शुरू किया था।
सरकार की दलील- समलैंगिक विवाह पर संवैधानिक घोषणा से बचे सुप्रीम कोर्ट
दलीलों के दौरान, केंद्र ने शीर्ष अदालत से कहा था कि समलैंगिक विवाह के लिए कानूनी मान्यता की मांग करने वाली याचिकाओं पर अदालत को संवैधानिक घोषणा करने से बचना चाहिए। सरकार ने कहा था कि कोई भी संवैधानिक घोषणा "कार्रवाई का सही तरीका" नहीं हो सकती है, क्योंकि अदालत पूर्वाभास, परिकल्पना नहीं कर सकती। सरकार के अनुसार, समलैंगिक विवाह के परिणामों को समझने और उनसे निपटने में भी अदालत सक्षम नहीं होगी।
याचिका का पुरजोर विरोध
केंद्र ने अदालत को यह भी बताया था कि उसे समलैंगिक विवाह के मुद्दे पर सात राज्यों से प्रतिक्रियाएं मिली हैं। सरकार के मुताबिक राजस्थान, आंध्र प्रदेश और असम की सरकारों ने ऐसे विवाह के लिए कानूनी मान्यता की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं के तर्क का पुरजोर विरोध किया था।