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SC Updates: नाबालिगों से जुड़ी सड़क दुर्घटनाओं के लिए माता-पिता जिम्मेदार, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Mon, 02 Feb 2026 07:25 PM IST
देवेश त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारत में गिरिजाघरों (चर्च) की राष्ट्रीय परिषद की ओर से दायर एक नई जनहित याचिका सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ राजस्थान और अरुणाचल प्रदेश सहित 12 राज्यों से उनके धर्मांतरण विरोधी कानूनों की वैधता को चुनौती देते हुए जवाब मांगा।

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नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेस इन इंडिया (एनसीसीआई) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोरा ने इन राज्यों के कानूनों के लागू किए जाने पर रोक लगाने की मांग की। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एनसीसीआई की दलीलों पर ध्यान दिया और केंद्र तथा 12 राज्य सरकारों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।

नए आवेदनों को लंबित आवेदनों के साथ जोड़ने का आदेश देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि तीन न्यायाधीशों की पीठ इन सभी पर एक साथ सुनवाई करेगी। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य के कानूनों को चुनौती देने वाली इसी तरह की याचिकाएं लंबित हैं। विधि अधिकारी ने कहा, 'हमारा जवाब तैयार है और जल्द ही दाखिल किया जाएगा।'

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शिअद नेता विक्रम मजीठिया को सुप्रीम कोर्ट से राहत
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया को आय से अधिक संपत्ति के मामले में जमानत दे दी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली मजीठिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया, जिसमें उन्हें इस मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि मजीठिया इस मामले में पिछले सात महीनों से हिरासत में है।

पिछले साल 4 दिसंबर को दिए अपने आदेश में हाईकोर्ट ने मजीठिया की जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि जांच को प्रभावित करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। पंजाब सतर्कता ब्यूरो को तीन महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करने का निर्देश देते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि इसके बाद मजीठिया जमानत पर रिहाई की मांग कर सकते हैं।

पंजाब सतर्कता ब्यूरो ने पिछले साल 25 जून को आय से अधिक संपत्ति के मामले में मजीठिया को गिरफ्तार किया था, जिसमें कथित तौर पर 540 करोड़ रुपये की संपत्ति जमा करने का आरोप है। मजीठिया के खिलाफ दर्ज एफआईआर, पंजाब पुलिस की एक विशेष जांच टीम द्वारा 2021 के एक ड्रग मामले की चल रही जांच से संबंधित है।
 

सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा परियोजना से जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ दिवालियापन की कार्यवाही को रखा बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को रियल एस्टेट फर्मों भसीन इन्फोटेक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड और ग्रैंड वेनेजिया कमर्शियल टावर्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान कार्यवाही शुरू करने के फैसले को बरकरार रखा। इस फैसले से घर खरीदारों और वाणिज्यिक आवंटियों के अधिकारों को मजबूती मिली।

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने सतिंदर सिंह भसीन सहित दोनों कंपनियों के पूर्व निदेशकों की ओर से दायर अपीलों को खारिज कर दिया। पीठ ने माना कि डेवलपर्स कार्यात्मक इकाइयां देने में विफल रहे और परियोजना के पूरा होने के संबंध में अदालत को गुमराह किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि निर्माण कार्य सभी दृष्टियों से पूर्ण हो चुका था और कुछ याचिकाकर्ता आवंटियों को कब्जा सौंप दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह तर्क बिना किसी योग्यता और तथ्यात्मक आधार पर दिया गया है।

यह मामला ग्रेटर नोएडा स्थित ग्रैंड वेनेजिया कमर्शियल टॉवर के 141 आवंटियों की ओर से 2021 में दायर एक याचिका से सामने आया। आवंटियों ने आरोप लगाया था कि मई 2013 तक कब्जा देने का वादा किया गया था, लेकिन इकाइयां रहने योग्य नहीं थीं। उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीएसआईडीए) से पूर्णता प्रमाण पत्र नहीं मिला था और डेवलपर्स ने निश्चित रिटर्न का भुगतान करना बंद कर दिया था।

आई-पैक छापे को लेकर ईडी की याचिका सुनवाई योग्य नहीं: पश्चिम बंगाल का सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा
पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय की उस याचिका की वैधता को चुनौती दी है जिसमें आई-पैक के कोलकाता कार्यालय पर की गई छापेमारी में कथित हस्तक्षेप का आरोप लगाया गया है। सरकार ने इसके लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय में इसी तरह के एक मामले के लंबित होने का हवाला दिया है।

15 जनवरी को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और विपुल पंचोली की पीठ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल सरकार, डीजीपी राजीव कुमार और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को ईडी की याचिका पर नोटिस जारी किया था। इसमें उन पर राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक के परिसरों पर छापे में कथित रूप से बाधा डालने के आरोप में सीबीआई जांच की मांग की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ईडी की जांच में मुख्यमंत्री की ओर से कथित तौर पर 'बाधा डालना' बहुत गंभीर है। इसके साथ ही इस बात की जांच करने पर सहमति जताई थी कि क्या राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी गंभीर अपराध की केंद्रीय एजेंसी की जांच में हस्तक्षेप कर सकती हैं।

अदालत ने ईडी के उन अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर भी रोक लगा दी थी, जिन्होंने 8 जनवरी को आई-पैक पर छापा मारा था। ईडी की याचिका पर अपना जवाब दाखिल करते हुए टीएमसी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने कहा कि चूंकि इसी तरह का एक मामला कलकत्ता उच्च न्यायालय में लंबित है, इसलिए दो संवैधानिक अदालतों के समक्ष 'समानांतर कार्यवाही' नहीं हो सकती है।

नाबालिगों से जुड़ी सड़क दुर्घटनाओं के लिए माता-पिता जिम्मेदार : शीर्ष कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में पुणे के चर्चित पोर्श कार हादसे में तीन आरोपियों को जमानत दे दी, जिसमें एक नाबालिग के तेज रफ्तार और लापरवाही से गाड़ी चलाने से दो लोगों की मौत हो गई थी। जमानत देते हुए कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की और कहा कि ऐसे हादसों के लिए माता-पिता सबसे बड़े जिम्मेदार हैं क्योंकि उनका अपने बच्चों पर कोई नियंत्रण नहीं होता है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ कहा यह बेहद दुखद है कि कुछ माता-पिता अपने नाबालिग बच्चों को हाई स्पीड कारें उपलब्ध कराते हैं और उन्हें शराब व नशे जैसी चीजों के साथ पार्टी करने की छूट देते हैं। अदालत ने कहा कि जश्न का मतलब नशा और तेज रफ्तार नहीं होता। दो निर्दोष लोगों की जान चली गई, इसके लिए माता-पिता भी जिम्मेदार हैं जो बच्चों को पर्याप्त पैसे देते हैं।

माता-पिता की भूमिका पर सवाल : अदालत ने माता-पिता की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार उनके पास बच्चों के लिए समय नहीं होता, इसलिए वे उन्हें एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन देकर जिम्मेदारी से बच जाते हैं। कानून को ऐसे मामलों में तेजी से कदम उठाने की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने तीन आरोपियों आदित्य सूद, आशीष मित्तल और संतोष गायकवाड़ को जमानत दी है। इन पर आरोप है कि उन्होंने नाबालिग चालक के परिवार की मदद करते हुए सबूतों से छेड़छाड़ की। 
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हिमंत की टिप्पणियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जमीयत उलमा-ए-हिंद

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की ओर से हाल ही में की गई कुछ सार्वजनिक टिप्पणियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें सरमा को सांप्रदायिक, अत्यधिक विभाजनकारी और संविधान की भावना के विपरीत बताया गया है। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने वकील एमआर शमशाद के जरिये दायर याचिका में सांविधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए सख्त और लागू करने योग्य दिशानिर्देश बनाने का आग्रह किया गया है। ताकि सार्वजनिक पदों का दुरुपयोग किसी भी समुदाय के प्रति घृणा फैलाने या उसे निशाना बनाने के लिए न किया जा सके। यह याचिका जमीयत की एक लंबित याचिका के संदर्भ में दायर की गई है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

याचिका में विशेष रूप से असम के मुख्यमंत्री के 27 जनवरी को दिए एक भाषण का उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने एक अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के खिलाफ कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यह तर्क दिया है कि ऐसे बयान, विशेषकर किसी उच्च सांविधानिक पद पर आसीन व्यक्ति की ओर से हो तो उसे राजनीतिक बयानबाजी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
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