मोइत्रा के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय में क्या कहा
मोइत्रा के वकील ने कहा कि उनका इस मामले में लोकसभा महासचिव की ओर से दाखिल जवाब पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का इरादा नहीं है। पीठ ने कहा, छह मई से शुरू होने वाले सप्ताह में एक गैर -विधिक दिन सूचीबद्ध करें। याचिकाकर्ता (महुआ मोइत्रा) के वकील ने कहा है कि उनका जवाबी हलफनामा दाखिल करने का इरादा नहीं है।
शीर्ष अदालत ने लोकसभा महासचिव से मांगा था जवाब
उच्चतम न्यायालय ने तीन जनवरी को मोइत्रा की याचिका पर लोकसभा महासचिव से जवाब मांगा था। मोइत्रा ने याचिका में कहा था कि उन्हें लोकसभा की कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दी जाए। पीठ ने यह कहते हुए आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था कि इसकी अनुमति टीएमसी नेता को राहत देने के समान होगी। शीर्ष अदालत ने लोकसभा अध्यक्ष और सदन की आचार समिति को भी नोटिस जारी करने से इनकार किया था। मोइत्रा ने अपनी याचिका में दोनों को प्रतिवादी बनाया है।
लोकसभा में पारित हुआ था निष्कासन का प्रस्ताव
आचार समिति की रिपोर्ट पर पिछले साल आठ दिसंबर को लोकसभा में तीखी बहस हुई थी। इस दौरान मोइत्रा को बोलने का मौका नहीं दिया गया था। संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने अनैतिक आचरण के लिए टीएमसी सांसद को सदन से निष्कासित करने का प्रस्ताव पेश किया था। प्रस्ताव को ध्वनिमत से पारित कर लिया गया था। जोशी ने कहा था कि आचार समिति ने मोइत्रा को अनैतिक आचरण और सदन की अवमानना का दोषी पाया। उन्होंने लोकसभा सदस्यों की यूजर आईडी और पासवर्ड को ऐसे लोगों के साथ साझा किया था जो इसके लिए अधिकृत नहीं थे। जिसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ा।
आचार समिति ने की थी जांच की सिफारिश
समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि मोइत्रा के आपत्तिजनक, अनैतिक, जघन्य और आपराधिक आचरण को देखते हुए सरकार को एक तय समयसीमा के भीतर कानूनी और संस्थागत जांच शुरू जानी चाहिए।प्रह्लाद जोशी द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव में कहा गया था कि एक कारोबारी के हितों को आगे बढ़ाने के लिए उपहार स्वीकार करने और अवैध रिश्वत लेने के लिए एक सांसद के रूप में मोइत्रा का आचरण अशोभनीय पाया गया, जो किए एक गंभीर अपराध और अत्यधिक निंदनीय आचरण है। इससे पहले आचार समिति के अध्यक्ष विनोद कुमार सोनकर ने मोइत्रा के खिलाफ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा दायर शिकायत समिति की रिपोर्ट पेश की थी।
शीर्ष अदालत ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार
सर्वोच्च न्यायालय ने आज उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर विचार करने से इनकार किया, जिसमें जेल अधिकारियों को कैदियों को एकांत कारावास में रखने का अधिकार देने वाले दंडात्मक कानून के प्रावधानों को रद्द करने के लिए संसद को निर्देश देने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने हैरानी जताते हुए कहा, हम किसी प्रावधान को रद्द करने के लिए संसद को निर्देश कैसे दे सकते हैं? पीठ ने कहा, याचिका कैदियों के साथ भेदभाव और मौलिक अधिकारियों के उल्लंघन पर सवाल उठा सकती है। लेकिन कानून निर्माताओं को कानून निरस्त करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
शादी समारोह में हर्ष फायरिंग की घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण: शीर्ष अदालत
उच्चतम न्यायालय ने शादी समारोहों में हर्ष फायरिंग की घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। अदालत ने कहा कि इसके विनाशकारी परिणाम होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2016 के एक मामले में एक व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते समय यह टिप्पणी की। शादी समारोह में हर्ष फायरिंग के दौरान एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा, हमारे देश में विवाह समारोह के दौरान हर्ष फायरिंग एक दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन प्रचलित प्रथा है। यह मामला जश्न में अनियंत्रित और अवांछित गोलीबारी के विनाशकारी परिणामों का उदाहरण है।
शीर्ष अदालत ने रद्द किया उच्च न्यायालय का आदेश
शीर्ष अदालत ने सोमवार पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद्द कर दिया है। उच्च न्यायालय ने आदेश हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की उन टिप्पणियों को हटाने के लिए कहा गया था, जो उन्होंने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका की 2016-17 की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट में की थी।
खेमका 2012 में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के जमीन सौदे की जांच से चर्चा में आए थे। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस तथ्य पर गौर किया कि खेमका द्वारा टिप्पणी और ग्रेडिंग के लिए दिए गए प्रतिवेदन पर हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है।
पीठ ने कहा, हमारी राय है कि उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने गलती की है। इसलिए हम उच्च न्यायालय की खंडपीठ के फैसले को रद्द करते हैं। इसके अलावा, जैसा कि हमें बताया गया है कि स्वीकार करने वाले प्राधिकारी (हरियाणा के मुख्यमंत्री) ने अभी तक प्रतिनिधित्व पर फैसला नहीं लिया है। हम प्राधिकारी को इस फैसले की घोषणा की तारीख से साठ दिनों की अवधि के भीतर वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट के नियमों के तहत निर्णय लेने का निर्देश देते हैं।