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SC: 'क्षमादान न केवल सांविधानिक अधिकार, बल्कि वैधानिक भी', नाबालिगों से जुड़े सामूहिक दुष्कर्म मामले पर अदालत

Tue, 02 Sep 2025 04:18 PM IST
दीपक कुमार शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे अभियुक्त के पास क्षमादान का एक वैधानिक उपाय भी है। पीठ ने कहा, 'सजा माफी मांगने का अधिकार न केवल एक सांविधानिक अधिकार है, बल्कि एक वैधानिक अधिकार भी है और प्रत्येक राज्य की सजा माफी की अपनी नीति है, जो तब भी लागू होती है जब सजा आईपीसी की धारा 376डीए या धारा 376डीबी के तहत दी जाती है।'
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि नाबालिगों से जुड़े सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में आजीवन कारावास की सजा पाए दोषियों की शेष जीवन अवधि के लिए क्षमादान मांगने का अधिकार न केवल सांविधानिक है, बल्कि वैधानिक भी है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर की, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 376डीए की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। 

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धारा 376डीए में 16 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़की से सामूहिक दुष्कर्म के दोषियों के लिए सजा का प्रावधान है। इसमें आजीवन कारावास या प्राकृतिक जीवन के शेष हिस्से तक जेल में रहने की सजा तय है।

इस मामले में पक्षकार बनने की मांग कर रहे एक आवेदक के वकील ने कहा कि धारा 376 डीए में 'Shall' शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब है कि सत्र न्यायालय के पास आजीवन कारावास, यानी उस व्यक्ति के शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। 
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पीठ ने दो पहलुओं की जांच की, जिनमें से पहला प्रावधान निर्धारित दंड पर था, जिसे सत्र न्यायालय में सुनवाई के बाद लागू किया जाना था, और इसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती थी। पीठ ने कहा, 'मामले का दूसरा पहलू यह है कि अगर किसी अभियुक्त पर ऐसी सजा भी लगाई जाती है, तो उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 72 या अनुच्छेद 161 के अनुसार, भारत के राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के समक्ष आवेदन करके सजा माफी का अधिकार है।'

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे अभियुक्त के पास क्षमादान का एक वैधानिक उपाय भी है। पीठ ने कहा, 'सजा माफी मांगने का अधिकार न केवल एक सांविधानिक अधिकार है, बल्कि एक वैधानिक अधिकार भी है और प्रत्येक राज्य की सजा माफी की अपनी नीति है, जो तब भी लागू होती है जब सजा आईपीसी की धारा 376डीए या धारा 376डीबी के तहत दी जाती है।' बता दें कि धारा 376डीबी 12 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म की सजा से संबंधित है। 

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अदालत ने कहा कि धारा 376डीए या 376डीबी के तहत आजीवन कारावास की सजा, शेष प्राकृतिक जीवन के लिए, संविधान, वैधानिक योजना और प्रत्येक राज्य में लागू छूट नीति के तहत किसी अभियुक्त के छूट मांगने के अधिकार को नहीं छीनेगी। वहीं, वकील ने कहा कि आईपीसी की धारा 376डीए के तहत निर्धारित सजा का अर्थ यह होगा कि दोषी से संबंधित कोई भी ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं, जिन पर विचार किया जा सके।

पीठ ने कहा कि केंद्र ने आईपीसी की धारा 376डीए का समर्थन किया है। शीर्ष अदालत ने धारा 376डीए के तहत सजा के एकमात्र प्रकार के निर्धारण पर याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए कानूनी प्रश्न को खुला छोड़ दिया और कहा कि इस पर उचित मामले में विचार किया जा सकता है। पीठ ने याचिका और पक्षकार बनाने के आवेदन का निपटारा करते हुए कहा, 'इसलिए, उचित मामले में आगे बढ़ाए जाने वाले कानूनी प्रश्न को खुला रखा जा रहा है।'
 

सुप्रीम कोर्ट ने एआईबीई फीस पर दायर याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (एआईबीई) के लिए वसूली जा रही 3,500 रुपये फीस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि बीसीआई परीक्षा आयोजित करने में काफी खर्च करता है और फीस लेना संविधान के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं है। इससे पहले शीर्ष अदालत ने अधिवक्ता संयम गांधी की याचिका पर बीसीआई को नोटिस जारी किया था। अदालत ने यह भी कहा था कि गांधी को पहले बीसीआई से संपर्क करना चाहिए था, उसके बाद ही कोर्ट आना चाहिए था। 

याचिका में आरोप लगाया गया था कि बीसीआई सामान्य और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों से 3,500 रुपये, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के उम्मीदवारों से 2,500 रुपये के अलावा अन्य शुल्क भी लेता है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि इस तरह की वसूली पर रोक लगाई जाए और एआईबीई-2025 के आवेदन प्रक्रिया में जो पैसा वसूला गया है, उसे वापस किया जाए।
 

गोविंद पानसरे के परिजनों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें तर्कवादी गोविंद पानसरे की 2015 में हुई हत्या के मामले की जांच की आगे निगरानी की आवश्यकता नहीं बताई गई थी। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह आदेश पानसरे की बेटी और बहू की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। यह याचिका हाईकोर्ट के 2 जनवरी के आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थी। पीठ ने एक सितंबर को कहा, 'नोटिस जारी किया जाए।'

2015 में पानसरे और उनकी पत्नी पर चलाई गई थीं गोलियां 
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के नेता और लेखक पानसरे और उनकी पत्नी उमा पर 16 फरवरी 2015 को कोल्हापुर में सुबह की सैर के दौरान गोलियां चलाई गई थीं। पानसरे की 20 फरवरी को मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी बच गईं। शुरुआत में यह जांच पुलिस के अपराध अन्वेषण विभाग के विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा की गई थी, लेकिन 2022 में इसे महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ता (एटीएस) को सौंप दिया गया। हाईकोर्ट 2016 से इस मामले की जांच की निगरानी कर रहा था और एजेंसियां नियमित रिपोर्ट देती रही थीं।

एटीएस ने जांच में नहीं की प्रगति, फिर भी हाईकोर्ट ने खत्म की निगरानी
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हाईकोर्ट ने यह नजरअंदाज किया कि 3 अगस्त 2022 को इसकी ही एक अन्य पीठ ने जांच एसआईटी से लेकर एटीएस को इसलिए सौंपी थी, ताकि बड़े षड्यंत्र का पर्दाफाश हो सके और फरार शूटरों को पकड़ा जा सके। याचिका में कहा गया है कि भले ही एटीएस ने जांच में कोई ठोस प्रगति नहीं की, फिर भी हाईकोर्ट ने निगरानी खत्म कर दी और कहा कि अब सिर्फ फरार आरोपियों की गिरफ्तारी बाकी है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा- कोर्ट की निगरानी जरूरी है
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एसआईटी की चार्जशीट और सामग्री से साफ है कि इसमें गहरी और बड़ी साजिश है और पानसरे की हत्या अकेली घटना नहीं है। उनका कहना है कि तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर, पानसरे, कन्नड़ विद्वान एमएम कलबुर्गी और पत्रकार गौरी लंकेश की हत्याएं आपस में जुड़ी हुई हैं। फिर भी शूटर और साजिशकर्ताओं को पकड़ा नहीं गया, इसलिए कोर्ट की निगरानी जरूरी है।
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सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) को निर्देश दिया कि वह सुपर कप और उसके नियंत्रण में आने वाली अन्य प्रतियोगिताओं के संबंध में 2025-26 सीजन के लिए फुटबॉल कैलेंडर को समय पर शुरू करने के सभी आवश्यक उपाय करे। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एआईएफएफ को इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) के संचालन में वाणिज्यिक साझेदार के चयन हेतु खुली, प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी प्रक्रिया के लिए बोलियां आमंत्रित करते हुए निविदाएं जारी करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने एआईएफएफ के लिए एक सक्षम वाणिज्यिक साझेदार तलाशने की प्रक्रिया की देखरेख के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एल नागेश्वर राव को नियुक्त किया है। एआईएफएफ और उसके वाणिज्यिक साझेदार एफएसडीएल के लिए नियुक्त वकीलों ने पीठ को बताया कि वे भारतीय फुटबॉल सत्र 2025-26 के संचालन के लिए एक आम सहमति से प्रस्ताव लेकर आए हैं।

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