संविधानिक प्रावधान और राष्ट्रपति का कदम
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी। उन्होंने पूछा था कि क्या न्यायालय यह तय कर सकता है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को बिलों पर कब तक निर्णय लेना चाहिए। राष्ट्रपति ने अपने पांच पन्नों के संदर्भ पत्र में 14 सवाल रखे हैं, जिनका जवाब सुप्रीम कोर्ट से मांगा गया है। यह सवाल मुख्य रूप से अनुच्छेद 200 और 201 से जुड़े हैं, जिनमें राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों का जिक्र है।
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निर्णय किसने लिखा...नाम नहीं
111 पन्नों के संविधान पीठ के इस फैसले से राज्यपाल की शक्तियों पर नए सिरे से बहस छिड़ सकती है। खास यह भी फैसले में इसे लिखने वाले जज का नाम नहीं दिया गया है। ऐसा बेहद कम मामलों में होता है। 2019 में भी राम जन्मभूमि मामले में संविधान पीठ के फैसले में जज का नाम नहीं था। सीजेआई जस्टिस गवई रविवार को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं।
आदेश...जिस पर उठे थे सवाल
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने 8 अप्रैल को तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल के मामले में कहा था-अगर राज्यपाल किसी विधेयक पर मंजूरी नहीं देते हैं या उसे रिजर्व नहीं रखते हैं, तो उन्हें तीन महीने के अंदर और अगर कोई विधेयक दोबारा पास होता है तो एक महीने के अंदर उस पर फैसला लेना होगा।
- पीठ ने राष्ट्रपति के लिए भी समयसीमा तय करते हुए कहा था, राष्ट्रपति को राज्यपाल की ओर से उनके विचार के लिए रिजर्व किए विधेयकों पर रेफरेंस मिलने की तारीख से तीन महीने के अंदर फैसला लेना होगा। कहा, अगर राष्ट्रपति और राज्यपाल तय समयसीमा में विधेयकों पर कार्रवाई नहीं करते तो उन्हें स्वत: मंजूर मान लिया जाएगा।
- मंजूरी नहीं देने को बताया था मनमाना: खंडपीठ ने फैसले में यह भी कहा था, तमिलनाडु के राज्यपाल का 10 विधेयकों पर मंजूरी नहीं देने का फैसला गैर-कानूनी और मनमाना था। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके उन विधेयकों को पास व मंजूर घोषित कर दिया था।